बरेलीस्मार्ट सिटी के नाम पर हजारों करोड़ खर्च,
बरेली के विकास पर गंभीर सवाल: सपा के पूर्व प्रवक्ता मयंक शुक्ला ने भाजपा सरकार और प्रशासन से मांगा जवाब
बरेली: उत्तर प्रदेश की ‘स्मार्ट सिटी’ बरेली में विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के फासले को लेकर सियासत गरमा गई है। समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता मयंक शुक्ला ने एक विस्तृत बयान जारी कर स्थानीय जिला प्रशासन, भाजपा सरकार और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के खिलाफ तीखा मोर्चा खोला है। उन्होंने शहर की बदहाल कानून-व्यवस्था, लटकी हुई परियोजनाओं और प्रशासनिक शिथिलता पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए जवाबदेही तय करने की मांग की है।
उद्घाटन के सालों बाद भी धूल फांक रही हैं करोड़ों की योजनाएं
मयंक शुक्ला ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री द्वारा उद्घाटित की गईं अनेक महत्वपूर्ण परियोजनाएं वर्षों बीत जाने के बाद भी जनता को समर्पित नहीं की जा सकी हैं:
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स्काईवॉक परियोजना: करोड़ों की लागत से बना स्काईवॉक आज तक जनता के लिए नहीं खोला गया। यह सरकारी धन की बर्बादी का प्रतीक बन चुका है।
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संजय कम्युनिटी हॉल का अमृत सरोवर: यह परिसर आज भी आम नागरिकों के किसी उपयोग में नहीं आ पा रहा है।
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नगर निगम कॉम्प्लेक्स: रेलवे स्टेशन के पास निर्मित यह व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स भी उद्घाटन के बाद से ही उपेक्षित और बंद पड़ा है।
काष्ठकला और सीएम ग्रिड योजना में अनियमितताओं के आरोप
बयान में विकास कार्यों की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए दो मुख्य मामलों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई है:
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काष्ठकला केंद्र: इस निर्माणाधीन परियोजना में पहले निर्माण कार्य कराना, फिर उसे तोड़ना और दोबारा बनाना पूरे प्रोजेक्ट की पारदर्शिता और प्रशासनिक दूरदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
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सीएम ग्रिड योजना (दीनदयालपुरम): इस योजना के तहत दीनदयालपुरम क्षेत्र के विकास का बड़ा दावा किया गया था। निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के बाद भी यहां की सड़कें टूटी हैं, पार्किंग व्यवस्था ध्वस्त है और पूरा क्षेत्र अव्यवस्थित है।
बरेली की बदहाली: पूर्व सपा प्रवक्ता द्वारा उठाए गए मुख्य मुद्दे
मयंक शुक्ला ने बरेली शहर की २५ से अधिक जलंत समस्याओं की सूची साझा करते हुए प्रशासन के मौन पर सवाल उठाया है:
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स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा: जमीन न मिलने के कारण क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल का बरेली से लखनऊ स्थानांतरित होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके अलावा, ३०० बेड का अस्पताल पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो पा रहा है, १०० बेड का यूनानी अस्पताल जनता को समर्पित नहीं हुआ और स्वास्थ्य विभाग में ‘सिंडिकेट’ राज की शिकायतें लगातार आ रही हैं। एम्स (AIIMS) की स्थापना के लिए भी कोई ठोस प्रयास नहीं दिख रहा।
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औद्योगिक व तकनीकी पिछड़ापन: सीबीगंज का बहुप्रचारित आईटी पार्क (IT Park) अब तक शुरू नहीं हो सका है, वहीं रबर फैक्ट्री की लगभग १३८० एकड़ की कीमती भूमि वर्षों से बेकार पड़ी है।
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शहरी कुप्रबंधन व जाम: करोड़ों रुपये खर्च कर लगाए गए ट्रैफिक सिग्नल निष्प्रभावी साबित हो रहे हैं और पूरा शहर जाम से जूझ रहा है। स्मार्ट सिटी के नाम पर लगाए गए स्मार्ट मीटर जनता पर आर्थिक बोझ बन गए हैं। किला ओवरब्रिज कुछ ही वर्षों में जर्जर स्थिति में पहुंच गया है।
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सड़कें, सुरक्षा और पर्यावरण: खुले मेनहोल राहगीरों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं, सुभाषनगर पुलिया वर्षों से उपेक्षा का शिकार है और शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) लगातार खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है। ठंड के मौसम में रैन बसेरों और अलाव की पर्याप्त व्यवस्था करने में भी प्रशासन विफल रहा है। डेलापीर क्षेत्र में बेसहारा गौवंश कूड़े के ढेर से पेट भरने को मजबूर हैं।
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अभिभावकों का शोषण: निजी स्कूलों द्वारा महंगी कॉपियों-किताबों और स्कूल ड्रेस के नाम पर अभिभावकों का आर्थिक शोषण धड़ल्ले से जारी है, जिस पर शिक्षा विभाग मौन है।
“जनता को घोषणाएं नहीं, धरातल पर विकास चाहिए”
समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रवक्ता मयंक शुक्ला ने साफ शब्दों में कहा कि बरेली की जनता अब केवल उद्घाटनों और कागजी घोषणाओं से बहलने वाली नहीं है। उन्होंने जिला प्रशासन और सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधियों से इन सभी मुद्दों पर स्पष्टीकरण की मांग की है। उन्होंने कहा कि जनता के टैक्स के पैसे का सही उपयोग होना चाहिए, अधूरी परियोजनाओं को शीघ्र पूरा किया जाए और भ्रष्टाचार व वित्तीय अनियमितताओं में शामिल दोषियों की जवाबदेही तय कर उन पर सख्त कार्रवाई की जाए।
(गोपाल चन्द्र अग्रवाल,संपादक)
(एडिटर (Allrights Magazine)

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