**आरक्षण पर उमर अब्दुल्ला की चेतावनी**
J&K: आरक्षण देरी पर उमर सख्त
डिजिटल डेस्क, जम्मू। जम्मू-कश्मीर में आरक्षण नीति में प्रस्तावित बदलावों और उसके क्रियान्वयन में हो रही देरी को लेकर राजनीति गर्मा गई है। राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने आरक्षण नियमों के राशनलाइजेशन (युक्तिकरण) की फाइल को मंजूरी मिलने में हो रहे विलंब पर गहरी नाराजगी और चिंता व्यक्त की है। उन्होंने केंद्र सरकार और उपराज्यपाल प्रशासन को आगाह करते हुए कहा कि यदि युवाओं की इस संवेदनशील मांग का जल्द से जल्द न्यायसंगत समाधान नहीं निकाला गया, तो जम्मू-कश्मीर के युवाओं और खासकर ‘जेन-जी’ (Gen-Z) पीढ़ी के भीतर असंतोष का भयानक गुबार फूट सकता है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट लहजे में कहा कि यदि देरी के कारण कोई जनांदोलन या अप्रिय स्थिति पैदा होती है, तो उसके लिए राज्य सरकार कतई जिम्मेदार नहीं होगी।
“हम उम्मीद लगाए बैठे हैं, दिल्ली में होगी बात”
जम्मू में पत्रकारों से बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बताया कि उनकी सरकार ने जनता से किए गए वादों के मुताबिक आरक्षण नीति की समीक्षा का काम पूरी निष्ठा से पूरा किया है। उन्होंने कहा, “मैं उम्मीद लगाकर बैठा हूं। आरक्षण पर हमने अपनी तरफ से जो भी आपत्तियां और सवाल उठाए गए थे, उन्हें गहराई से देखा। जो प्रपोजल तैयार किया गया था, उसमें कुछ आपत्तियां आई थीं, जिन्हें हमने बाद में संशोधित भी किया। अब हमारी ओर से प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।”
उमर अब्दुल्ला ने आगे जानकारी दी कि वह जल्द ही राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के दौरे पर जाने वाले हैं, जहां वे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर इस विषय पर सीधी बातचीत करेंगे। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “कोई हमें आधिकारिक रूप से बताए कि क्या हमारे जवाब को दिल्ली (गृह मंत्रालय) भेजा गया है? क्या वहां से इसे हरी झंडी या मंजूरी मिली है? क्योंकि हम चाहते हैं कि चीजें पारदर्शी और त्वरित रहें।”
‘Gen-Z’ आंदोलन का खतरा: “फिर हम कसूरवार नहीं होंगे”
संवाददाता सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने बांग्लादेश और दुनिया के अन्य हिस्सों में युवाओं (Gen-Z) द्वारा किए गए तीव्र प्रदर्शनों का परोक्ष रूप से उल्लेख करते हुए चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि युवाओं के धैर्य की एक सीमा होती है और यदि नौकरियां तथा शैक्षणिक अवसर उनसे दूर होंगे, तो उनका गुस्सा भड़क सकता है।
उमर अब्दुल्ला ने कहा, “हम सिर्फ यह चाहते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि ‘जेन-जी’ (Gen-Z) वाला सिलसिला यहां जम्मू-कश्मीर में भी शुरू हो जाए। अगर युवाओं का गुस्सा सड़कों पर फूटता है, तो उसके लिए हमारी सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हमने अपना काम समय पर और पूरी जिम्मेदारी से पूरा कर दिया है। अब गेंद केंद्र सरकार और उपराज्यपाल प्रशासन के पाले में है।”
क्या है जम्मू-कश्मीर का आरक्षण विवाद?
जम्मू-कश्मीर में आरक्षण का मुद्दा पिछले काफी समय से बेहद संवेदनशील और विवादास्पद बना हुआ है। वास्तव में, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व वाले प्रशासन द्वारा आरक्षण नियमों में बड़ा संशोधन किया गया था। इसके तहत पहाड़ी भाषी लोगों, अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) और कई नए वर्गों को आरक्षण के दायरे में शामिल किया गया था।
इस संशोधन के कारण राज्य में कुल आरक्षण का दायरा बढ़कर 65% से 70% के पार चला गया। इसका सीधा असर ‘ओपन मेरिट’ (सामान्य वर्ग) के छात्रों और नौकरी चाहने वाले युवाओं पर पड़ा, जिनके लिए अवसर सिमटकर महज 30% से 35% के आसपास रह गए। इसके बाद घाटी और जम्मू दोनों संभागों में सामान्य वर्ग के युवाओं, छात्रों और कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए थे।
कैबिनेट सब-कमेटी और नेशनल कॉन्फ्रेंस का वादा
उमर अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में वादा किया था कि सरकार बनने पर आरक्षण नीति का पुनर्मूल्यांकन और राशनलाइजेशन (युक्तिकरण) किया जाएगा। सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री ने एक उच्चस्तरीय कैबिनेट सब-कमेटी (Cabinet Sub-Committee) का गठन किया था।
इस उप-समिति ने व्यापक विचार-विमर्श और कानूनी समीक्षा के बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। मुख्यमंत्री के अनुसार, कैबिनेट ने इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए ऐसा संतुलन बनाने का प्रयास किया है, जिससे किसी भी वर्ग या समुदाय के साथ अन्याय न हो और ओपन मेरिट के हिस्से को भी बढ़ाया जा सके। हालांकि, केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते अंतिम मंजूरी उपराज्यपाल और केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है, जहां से फाइल अब तक लंबित है।
कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा पर भी बोले CM
पत्रकारों से बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री ने केवल आरक्षण ही नहीं, बल्कि घाटी में सुरक्षा व्यवस्था पर भी अपनी बात रखी। हाल ही में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को आतंकवादी संगठनों से मिली धमकियों के संदर्भ में उमर अब्दुल्ला ने सख्त हिदायत दी।
उन्होंने कहा, “घाटी में प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज (PMRP) के तहत कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को मिल रही आतंकी धमकियों को सुरक्षा एजेंसियों और जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा कतई हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। हमें बार-बार कहा जाता है कि स्थिति सामान्य हो रही है, लेकिन अगर हमारे नागरिक और कर्मचारी डरे हुए हैं, तो उनकी सुरक्षा प्राथमिकता होनी चाहिए।”
निष्कर्ष और आगे की राह
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में आरक्षण और रोजगार सबसे ज्वलंत मुद्दे बने हुए हैं। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का यह बयान स्पष्ट संकेत देता है कि राज्य सरकार जन-असंतोष को लेकर काफी गंभीर है और केंद्र पर जल्द फैसला लेने का दबाव बना रही है। अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री की आगामी दिल्ली यात्रा और गृह मंत्री से प्रस्तावित मुलाकात के बाद इस नीति को कब तक अंतिम मंजूरी मिलती है।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)

