केसी बोकाडिया की फिल्म तीसरी बेगम
केसी बोकाडिया की ‘तीसरी बेगम’: रिश्तों, धोखे और आत्मसम्मान की दमदार दास्तान; फिल्म में दिखा महिला शक्ति का असरदार चेहरा
(मुंबई – अनिल बेदाग): हिंदी सिनेमा में सामाजिक और यथार्थवादी मुद्दों पर आधारित फिल्में हमेशा से दर्शकों के दिलों को छूती रही हैं. ‘तेरी मेहरबानियाँ’, ‘प्यार झुकता नहीं’ और ‘आज का अर्जुन’ जैसी ब्लॉकबस्टर और यादगार फिल्में देने वाले अनुभवी निर्माता-निर्देशक के. सी. बोकाडिया अपनी नई फिल्म ‘तीसरी बेगम’ के साथ इसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. इस बार बोकाडिया जी महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) और बहुविवाह (Polygamy) जैसे संवेदनशील व ज्वलंत सामाजिक मुद्दे को बेहद प्रभावशाली और कड़े अंदाज़ में बड़े पर्दे पर लेकर आए हैं.
धोखे की बुनियाद पर टिकी शादी और फिर आत्मसम्मान की जंग
फिल्म का ताना-बाना एक बेहद मार्मिक और झकझोर देने वाली कहानी के इर्द-गिर्द बुना गया है:
-
नगमा का संघर्ष: फिल्म की मुख्य कहानी पूजा दीक्षित नाम की एक मासूम और सीधी-सादी युवती के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी शादी छल-कपट और धोखे से बब्बन खान नाम के व्यक्ति से करा दी जाती है.
-
पहचान और नाम का बदलना: शादी के बाद सामाजिक और पारिवारिक दबाव में उसका नाम बदलकर ‘नगमा’ रख दिया जाता है.
-
कड़वा सच: नगमा की जिंदगी में भूचाल तब आता है, जब उसे अपने ससुराल पहुंचने पर यह कड़वा सच पता चलता है कि उसके पति की पहले से ही दो पत्नियां और हैं. वह इस घर में ‘तीसरी बेगम’ बनकर आई है.
जब अत्याचार के खिलाफ एक मंच पर आईं तीन पत्नियां
यहीं से फिल्म में आत्मसम्मान, अधिकारों के लिए संघर्ष और घरेलू अन्याय के खिलाफ एक नई और अनोखी लड़ाई की शुरुआत होती है:
-
महिला शक्ति का उदय: कहानी में मुख्य मोड़ और रोमांच तब आता है, जब बब्बन खान की प्रताड़ना से तंग आकर उसकी तीनों पत्नियां आपसी मतभेद भुलाकर एक हो जाती हैं.
-
अत्याचार का अंत: तीनों महिलाएं मिलकर अपने अत्याचारी और धोखेबाज पति के खिलाफ मजबूती से खड़ी होती हैं और उसे सबक सिखाती हैं. फिल्म का यह हिस्सा महिला एकजुटता और अदम्य साहस का एक शानदार उदाहरण पेश करता है.
मुग्धा गोडसे और कायनात अरोड़ा का शानदार अभिनय; यूपी की रियल लोकेशंस
फिल्म को तकनीकी और रचनात्मक रूप से मजबूत बनाने के लिए इसके कलाकारों और लोकेशंस पर विशेष ध्यान दिया गया है:
-
दमदार परफॉर्मेंस: बॉलीवुड की जानी-मानी अभिनेत्री मुग्धा गोडसे, कायनात अरोड़ा और अनुभवी अदाकारा जरीना वहाब ने अपने संजीदा और सधे हुए अभिनय से फिल्म की कहानी को गहरी भावनात्मक ऊंचाई दी है. हर एक किरदार ने महिलाओं के दर्द और उनके आक्रोश को पर्दे पर जीवंत कर दिया है.
-
वास्तविक फिल्मांकन: फिल्म की प्रामाणिकता को बनाए रखने के लिए इसकी शूटिंग उत्तर प्रदेश के लखनऊ और बनारस (वाराणसी) की वास्तविक और खूबसूरत लोकेशंस पर की गई है, जो फिल्म के मिजाज को पूरी तरह सपोर्ट करती है.
के. सी. बोकाडिया की यह फिल्म न केवल दर्शकों का मनोरंजन करती है, बल्कि समाज की रूढ़िवादी सोच पर कड़ा प्रहार करते हुए एक बेहद सशक्त और जरूरी सामाजिक संदेश देने में पूरी तरह सफल रहती है.
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,सीनियर एडिटर
(Allrights Magazine)

राजकोट में बनेगा दुनिया का सबसे बड़ा वृद्धाश्रम!
