इंदौर स्वच्छता की चमक के पीछे सफाईकर्मियों का दर्द: ठेका प्रथा बंद करने और पक्की नौकरी की मांग ने पकड़ा जोर

“इंदौर मॉडल की आड़ में सफाईकर्मियों के शोषण का आरोप: ठेका प्रथा खत्म करने और नियमितीकरण की मांग तेज”

विशेष रिपोर्ट: सामाजिक न्याय एवं नागरिक अधिकार (ऑल राइट्स मैगजीन)

इंदौर/भोपाल: देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा लगातार हासिल करने वाले इंदौर की सफाई व्यवस्था एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहसों के केंद्र में आ गई है। स्वच्छता सर्वेक्षण में लगातार शीर्ष स्थान हासिल करने के पीछे जिन सफाईकर्मियों का पसीना और दिन-रात की मेहनत शामिल है, उन्हीं कर्मचारियों के अधिकारों और स्थायी रोजगार को लेकर राज्य सरकार और प्रशासन की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

कर्मचारी यूनियनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने ‘ठेका प्रथा’ (Contract System) को तुरंत समाप्त कर सफाईकर्मियों के नियमितीकरण (Regularisation) की जोरदार मांग उठाई है।

1. स्वच्छता का ‘इंदौर मॉडल’ और जमीनी हकीकत का विरोधाभास

इंदौर को लगातार देश का सबसे साफ शहर बनाने में अग्रिम पंक्ति के योद्धा (Frontline Workers) के रूप में कार्य करने वाले सफाई कर्मचारियों की स्थिति को लेकर कई गंभीर मुद्दे सामने आ रहे हैं:

  • ठेका प्रथा से शोषण का आरोप: विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि सरकार और नगर निगम इंदौर की स्वच्छता का श्रेय तो बड़े मंचों से लेते हैं, लेकिन इसके असली सूत्रधारों को आउटसोर्सिंग और ठेका प्रणाली के दलदल में धकेल रखा है।

  • कम वेतन और सुविधाओं का अभाव: ठेकेदारों के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों को न तो सही समय पर पूरा न्यूनतम वेतन मिलता है और न ही भविष्य निधि (PF), ईएसआई (ESI) व सुरक्षा उपकरणों जैसी बुनियादी सुविधाएं सुचारू रूप से दी जाती हैं।

2. प्रमुख मांगें: ठेका प्रथा बंद हो, पक्की नौकरी मिले

सफाई कर्मचारी संगठनों ने सरकार से आर-पार की लड़ाई का ऐलान करते हुए निम्नलिखित मुख्य मांगें रखी हैं:

  • सफाई व्यवस्था से ठेकेदारी का खात्मा: आउटसोर्सिंग और ठेका प्रथा को पूरी तरह बंद कर कर्मचारियों का सीधा नगर निगम में समायोजन किया जाए।

  • नियमितीकरण (Permanent Jobs): वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे दैनिक वेतनभोगी और आउटसोर्स कर्मचारियों को स्थायी (Regular) कर्मचारी का दर्जा दिया जाए।

  • समान काम, समान वेतन: जब तक नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ का सिद्धांत लागू किया जाए और समय पर वेतन भुगतान सुनिश्चित हो।

3. प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में गर्माया मुद्दा

सफाईकर्मियों के इस आंदोलन और उठती मांगों ने स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार पर भारी दबाव बना दिया है:

  • नागरिक अधिकारों की लड़ाई: सामाजिक संगठनों का मानना है कि केवल पुरस्कारों और ब्रांडिंग से इंदौर का मॉडल टिकाऊ नहीं रह सकता; इसके लिए सफाई व्यवस्था की रीढ़ यानी कर्मचारियों का सामाजिक व आर्थिक उत्थान सबसे जरूरी है।

  • प्रशासनिक रुख: दूसरी ओर, नगर निगम प्रशासन का तर्क रहता है कि वे आउटसोर्स एजेंसियों के जरिए नियमानुसार भुगतान और व्यवस्था का संचालन कर रहे हैं। हालांकि, ठेकेदारों पर निगरानी और कर्मचारियों की शिकायतों के निपटारे के लिए तंत्र सुधारने के आश्वासन दिए जाते हैं।

निष्कर्ष

इंदौर को स्वच्छता में नंबर-1 बनाने वाले सफाईकर्मियों का सम्मान केवल तालियों और प्रशस्ति पत्रों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके श्रम को उचित न्याय और स्थायित्व मिलना भी उतना ही आवश्यक है। ठेका प्रथा को खत्म करने और नियमितीकरण की यह आवाज आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश के अन्य निकायों में भी बड़ा आंदोलन बन सकती है।

‘ऑल राइट्स मैगजीन’ सफाईकर्मियों के हक, जनहित और श्रम अधिकारों से जुड़ी हर छोटी-बड़ी खबर निष्पक्षता से अपने पाठकों तक पहुंचाती रहेगी।

64 हजार हेक्टेयर भूमि को अवैध कब्जे से मुक्त कराकर आज उत्तर प्रदेश में गांव से लेकर प्रदेश स्तर तक खेल के मैदान, मिनी स्टेडियम, स्टेडियम और इंटरनेशनल स्टेडियम विकसित किए जा रहे हैं।

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