1 पैर पर स्कूल का सफर: रागिनी की कहानी
1 leg पर 400 मीटर की संघर्षपूर्ण राह: 7 वर्षीय रागिनी की कहानी ने प्रशासनिक दावों पर खड़े किए सवाल
नई दिल्ली: सोशल मीडिया और देश भर में 7 वर्षीय मासूम बच्ची रागिनी का एक वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा है, जिसने हर संवेदनशील नागरिक का दिल झकझोर कर रख दिया है। रागिनी को रोजाना अपनी पढ़ाई पूरी करने और स्कूल पहुँचने के लिए केवल एक पैर के सहारे 400 मीटर का लंबा और कठिन सफर तय करना पड़ता है। यह दृश्य जहाँ एक तरफ बच्ची के अदम्य साहस और शिक्षा के प्रति उसके जूनून को दर्शाता है, वहीं दूसरी तरफ हमारे सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता को भी उजागर करता है।
साहस की मिसाल, लेकिन व्यवस्था पर गहरा सवाल एक नन्हीं बच्ची का हर दिन एक पैर पर हॉप (Hop) करते हुए स्कूल जाना साहस और संकल्प का एक सशक्त प्रतीक है। लेकिन इसके साथ ही यह घटना एक कड़वी हकीकत को भी सामने लाती है कि आज भी दूर-दराज के क्षेत्रों में दिव्यांग बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्यों एक मासूम को केवल शिक्षा पाने के मौलिक अधिकार के लिए इस तरह के कठोर संघर्ष से गुजरना पड़ रहा है?
सुगम्य भारत अभियान और सुलभ सुविधाओं की पोल खुली देश भर में ‘सुगम्य भारत अभियान’ (Accessible India Campaign) और समावेशी शिक्षा के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन रागिनी की स्थिति यह दर्शाती है कि जमीनी स्तर पर स्थितियाँ अब भी चिंताजनक हैं। दिव्यांग बच्चों के लिए जरूरी सहायता उपकरण (जैसे ट्राई-साइकिल या प्रोस्थेटिक लेग) और सुलभ परिवहन साधनों का न होना सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र की विफलता को दर्शाता है। जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि स्थानीय प्रशासन तुरंत संज्ञान लेकर बच्ची को आवश्यक चिकित्सा assistance और संसाधन उपलब्ध कराए।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)

