लहसुन ₹400 पार: 2014 vs 2026 पर संग्राम
लहसुन ₹400 पार: 2014 में ₹70 किलो बिकने वाले लहसुन पर क्यों मचा है सियासी संग्राम? पढ़ें पूरा विश्लेषण
नई दिल्ली: देश की आम जनता और मध्यम वर्ग की रसोई का बजट एक बार फिर बुरी तरह चरमरा गया है। रोजमर्रा के खानपान का अहम हिस्सा माना जाने वाला लहसुन (Garlic) खुदरा बाजारों में ₹400 से ₹470 प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। लहसुन की इन आसमान छूती कीमतों ने न केवल गृहिणियों का बजट बिगाड़ दिया है, बल्कि देश के राजनीतिक गलियारों में ‘कांग्रेस बनाम भाजपा’ (UPA vs NDA) का तीखा सियासी संग्राम भी छेड़ दिया है।
वर्ष 2014 में जहां लहसुन ₹70 प्रति किलो के आसपास बिक रहा था, वहीं 2026 में इसके ₹470 तक पहुंचने को लेकर विपक्ष और सत्तापक्ष आमने-सामने आ गए हैं।
कांग्रेस का हमला: ‘महंगाई से बेहाल जनता, बजट फेल’
लहसुन और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों को लेकर विपक्ष ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है:
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रसोई के बजट पर सीधी मार: कांग्रेस प्रवक्ताओं का आरोप है कि बीते 12 वर्षों में आवश्यक वस्तुओं के दाम 5 से 6 गुना बढ़ चुके हैं। 2014 के यूपीए कार्यकाल के ₹70/किग्रा के मुकाबले आज का ₹470/किग्रा का भाव सरकार के महंगाई नियंत्रण के दावों की पोल खोलता है।
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जमाखोरी पर नियंत्रण का अभाव: विपक्ष का दावा है कि बिचौलियों और बड़े व्यापारियों द्वारा की जा रही अवैध जमाखोरी पर सरकार सख्त कार्रवाई करने में विफल रही है, जिसका खामियाजा सीधे उपभोक्ता को भुगतना पड़ रहा है।
भाजपा और विशेषज्ञों का तर्क: ‘मौसम की मार और किसानों को सही दाम’
दूसरी ओर, सत्तापक्ष और कृषि विशेषज्ञों ने कीमतों में उछाल के पीछे तकनीकी व प्राकृतिक कारणों का हवाला दिया है:
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बेमौसम बारिश और फसल की खराबी: प्रमुख लहसुन उत्पादक राज्यों (जैसे मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात) में अनिश्चित मानसूनी बारिश और कीटों के प्रकोप से फसल को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे बाजार में आपूर्ति (Supply Chain) प्रभावित हुई है।
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किसानों की आय में सुधार: सरकार का तर्क है कि मंडियों में बेहतर भाव मिलने से सीधे देश के किसानों को उनकी उपज का वाजिब और लाभकारी मूल्य मिल रहा है। इसके अलावा, ईंधन और परिवहन लागत (Transportation Cost) बढ़ने से भी खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी हुई है।
2014 बनाम 2026: एक तुलनात्मक नजरिया
| मानक | UPA कार्यकाल (2014) | NDA कार्यकाल (2026) |
| औसत खुदरा कीमत | ₹70 – ₹90 / किग्रा | ₹400 – ₹470 / किग्रा |
| मुख्य कारण | सामान्य मांग व स्थिर आपूर्ति | मौसमी विषमताएं व लॉजिस्टिक्स लागत |
| राजनीतिक नैरेटिव | “आम आदमी के बजट पर नियंत्रण” | “किसानों को उच्च मूल्य व वैश्विक प्रभाव” |
कब तक मिलेगी राहत?
मंडी व्यापारियों के अनुसार, जब तक नई फसल (New Crop Arrivals) की आवक पूर्ण रूप से बाजारों में शुरू नहीं हो जाती, तब तक लहसुन के दामों में बहुत बड़ी राहत मिलने की उम्मीद कम है। आम जनता को उम्मीद है कि सरकार जल्द ही बाजार में हस्तक्षेप (Market Intervention) कर जमाखोरी पर नकेल कसेगी और कीमतों को नियंत्रित करेगी।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)

