“सब जानते हैं फिर भी चुप्पी क्यों?”: शिकायतों और हादसों के बाद ही क्यों जागता है प्रशासनिक तंत्र?

“प्रशासनिक उदासीनता और व्यवस्था पर जनता का तीखा प्रहार: ‘क्यों हादसों और शिकायतों के बाद ही जागती है पुलिस?'”

विशेष रिपोर्ट: व्यवस्था, अपराध एवं प्रशासनिक जवाबदेही (ऑल राइट्स मैगजीन)

नई दिल्ली: देश की राजधानी और आसपास के इलाकों में स्पा सेंटर्स की आड़ में चल रहे अवैध कारोबार, बढ़ते अपराध और प्रशासनिक सुस्ती को लेकर जनता का गुस्सा अब खुलकर सामने आने लगा है। हाल ही में जयपुर, फरीदाबाद और दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न हिस्सों में सामने आए मामलों ने यह साबित कर दिया है कि पुलिस और प्रशासन को सब कुछ पहले से पता होता है, फिर भी वे ठोस कार्रवाई के लिए किसी बड़ी घटना या ऊपर से आने वाले दबाव का इंतजार क्यों करते हैं?

1. “सबको सब पता होता है, फिर भी खामोशी क्यों?”

  • खुफिया तंत्र और बीट पुलिसिंग की विफलता: आम नागरिकों और स्थानीय लोगों का यह सवाल पूरी तरह जायज है कि जब बीट कांस्टेबल से लेकर स्थानीय थाने तक हर अवैध गतिविधि की पूरी जानकारी होती है, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?

  • शिकायत का इंतजार क्यों?: पुलिस और प्रशासन अमूमन तब तक आंखें मूंदकर बैठे रहते हैं जब तक कोई लिखित शिकायत न मिले, मीडिया स्टिंग न सामने आए या फिर कोई बड़ा हादसा न हो जाए। क्या नियमित गश्त और खुफिया तंत्र का काम सिर्फ औपचारिकता निभाना रह गया है?

2. हादसों और घोटालों के बाद ही क्यों जागती है सरकार?

  • प्रशासनिक सुस्ती का दंश: चाहे अवैध निर्माण हो, सुरक्षा नियमों की धज्जियां उड़ाते संस्थान हों या फिर असामाजिक गतिविधियों के अड्डे—प्रशासनिक अमला हमेशा किसी बड़ी अनहोनी या जन-आक्रोश के बाद ही हरकत में आता है।

  • जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना: घटना के बाद कुछ दिनों तक औपचारिकता के लिए छापेमारी की जाती है, कुछ गिरफ्तारियां दिखाई जाती हैं, और फिर वही पुराना खेल दोबारा शुरू हो जाता है। यह रवैया प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

3. व्यवस्था पर गंभीर सवाल और जनता का आक्रोश

राजधानी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों को लेकर अक्सर यह चर्चा आम हो जाती है कि यहाँ अपराधियों और भ्रष्ट तंत्र के बीच गहरी सांठगांठ है। जब तक पुलिस महकमा अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता नहीं लाता और भ्रष्टाचार या मिलीभगत के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति सख्ती से लागू नहीं करता, तब तक आम जनता का प्रशासनिक तंत्र से भरोसा उठना स्वाभाविक है।

व्यवस्था को जवाबदेह बनाने के लिए अब केवल कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर पारदर्शी और निरंतर निगरानी की सख्त जरूरत है।

‘ऑल RIGHTs मैगजीन’ प्रशासनिक जवाबदेही, कानून-व्यवस्था की पोल खोलने वाली सचाइयों और जनहित के मुद्दों को पूरी बेबाकी और निष्पक्षता के साथ उठाती रहेगी।

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