2017 के सुधार से बदली बांस उद्योग की तस्वीर
बांस उद्योग की नई क्रांति: 2017 के ऐतिहासिक सुधार से बदला ग्रामीण भारत का परिदृश्य
नई दिल्ली: पूर्वोत्तर के दूर-दराज गांवों से लेकर मध्य भारत के किसानों और महाराष्ट्र की महिला समूहों तक, बांस अब केवल एक पारंपरिक हस्तशिल्प न रहकर ‘हरा सोना’ (Green Gold) बनकर उभर रहा है। गुरुग्राम के सरस आजीविका मेले और भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले (IITF) में बांस के वैश्विक-स्तरीय उत्पादों ने न केवल आम जनता बल्कि नीति-निर्माताओं का ध्यान आकर्षित किया है।
असम की विशाखा दीदी द्वारा 2014 में शुरू किए गए स्वयं सहायता समूह (SHG) से बांस के थैले बनाने और 2025 के व्यापार मेले में ₹2 लाख की रिकॉर्ड बिक्री का सफर इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि दूरदर्शी सरकारी नीतियों ने किस तरह स्थानीय कौशल को एक फलते-फूलते राष्ट्रीय उद्यम में बदल दिया है।
2017 का ऐतिहासिक कानून: ‘पेड़’ की श्रेणी से हटने से खुले तरक्की के द्वार
दशकों तक बांस की आर्थिक क्षमता ब्रिटिश काल के एक औपनिवेशिक कानून में उलझी रही, जहां बांस को ‘पेड़’ माना जाता था। इसके कारण इसकी कटाई और परिवहन पर बेहद कड़े वन कानून लागू होते थे।
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2017 का नीतिगत सुधार: केंद्र सरकार ने वर्ष 2017 में कानून में संशोधन कर गैर-वन क्षेत्रों में उगने वाले बांस को पेड़ की श्रेणी से बाहर कर दिया।
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प्रतिबंधों से मुक्ति: इस ऐतिहासिक निर्णय ने वन नियमों के कड़े चंगुल से बांस किसानों को आजाद किया, जिससे मूल्यवर्धन (Value Addition), नवाचार और अंतर-राज्यीय व्यापार के नए रास्ते खुले।
पूर्वोत्तर से मध्य भारत तक: उद्यमिता और वैज्ञानिक खेती का बोलबाला
राष्ट्रीय बांस मिशन (National Bamboo Mission) और NECTAR जैसी संस्थाओं के सहयोग से देश भर में बांस आधारित सफल मॉडल सामने आ रहे हैं:
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सिक्किम व त्रिपुरा: गंगटोक में चिमी ओंगमु भूटिया का ‘लगस्टल डिजाइन स्टूडियो’ महिलाओं के नेतृत्व में बांस हस्तशिल्प और फर्नीचर बना रहा है। त्रिपुरा में बिजॉय सूत्रधार ने बांस निर्माण में आधुनिक तकनीक अपनाई है।
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नागालैंड व मिजोरम: दीमापुर में ‘खोरोलो क्रिएटिव क्राफ्ट्स’ और SHG बांस के खाद्य उत्पादों में वैल्यू एडिशन कर रहे हैं, जबकि मिजोरम के मामित जिले में टिश्यू कल्चर (Tissue Culture) और पॉलीहाउस तकनीक से बांस की वैज्ञानिक खेती हो रही है।
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मध्य प्रदेश का किसान मॉडल: पारंपरिक खेती में नुकसान झेलने वाले मध्य प्रदेश के विजय पाटीदार ने 2019 में बांस मिशन के तहत 4,000 बांस के पौधे लगाए। महज 2 वर्षों में उन्होंने बांस की बल्लियां बेचकर ₹75,000 कमाए और साथ में मिर्च, अदरक व लहसुन की अंतर्फसल (Inter-cropping) से दोहरा लाभ अर्जित किया।
इंजीनियर्ड बांस और अगरबत्ती उद्योग: रोजगार व सामाजिक सशक्तीकरण
NECTAR की तकनीकों के जरिए बांस का मूल्यवर्धन 10% से बढ़कर 70% तक पहुंच चुका है, जिससे हर साल लगभग 3 करोड़ मानव-दिवस का रोजगार सृजित हो रहा है:
‘ऑल राइट्स मैगजीन’ का दृष्टिकोण
बांस अब केवल हस्तशिल्प तक सीमित नहीं है; यह टिकाऊ निर्माण (Sustainable Construction), प्लास्टिक के पर्यावरण-अनुकूल विकल्प और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने का सबसे सशक्त जरिया बन चुका है। सही नीतिगत फैसलों और बाजार संपर्कों से भारत का बांस क्षेत्र आने वाले समय में हरित अर्थव्यवस्था (Green Economy) की रीढ़ साबित होगा।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)
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