सौंदर्यीकरण की आड़ में गरीबी छिपाने का खेल
सौंदर्यीकरण की आड़ में गरीबी छिपाने का खेल: बुलडोजर और पर्दों की कूटनीति पर ‘ऑल राइट्स मैगजीन’ का बड़ा सवाल
नई दिल्ली: किसी भी अंतरराष्ट्रीय आयोजन या वीआईपी समिट के दौरान देश की राजधानी और प्रमुख महानगरों की सड़कों को सजाने-संवारने की कवायद कोई नई बात नहीं है। लेकिन हाल के वर्षों में सौंदर्यीकरण (Beautification) के नाम पर झुग्गी-झोपड़ियों और स्लम बस्तियों को हरे कपड़ों, बैनरों और बड़े-बड़े पर्दों से ढकने की प्रशासनिक परिपाटी ने एक गंभीर सामाजिक और नैतिक बहस को जन्म दे दिया है।
सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक आम जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक ही सवाल गूंज रहा है— “अगर हालात बदलने थे, तो गरीबी छिपाने के लिए पर्दे क्यों बदले जा रहे हैं?”
‘पर्दों के पीछे ढका भारत’: जमीनी हकीकत पर प्रशासनिक लीपापोती
वैश्विक बैठकों और हाई-प्रोफाइल दौरों के समय अक्सर यह देखा जाता है कि मुख्य मार्गों से गुजरने वाले विदेशी प्रतिनिधियों की नजरें भारत की वास्तविक गरीबी और विपन्नता पर न पड़ें, इसके लिए प्रशासन द्वारा किलोमीटर लंबे अस्थायी पर्दे या फ्लेक्स बोर्ड लगा दिए जाते हैं:
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छिपाने की कोशिश: झुग्गियों में रहने वाले लाखों नागरिक जो दैनिक मजदूरी, कबाड़ बीनने या छोटे-मोटे श्रम पर निर्भर हैं, उन्हें मुख्य सड़कों से एक ही झटके में ‘अदृश्य’ कर दिया जाता है।
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बुलडोजर की मार: कई बार सौंदर्यीकरण और अतिक्रमण हटाने के नाम पर नोटिस दिए बिना या बिना उचित पुनर्वास (Rehabilitation) के दशकों पुरानी बस्तियों को ध्वस्त कर दिया जाता है।
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सवाल नियत का: जनता पूछ रही है कि अरबों रुपये पर्दों, सजावटी लाइटों और दिखावे पर खर्च करने के बजाय यदि यही बजट झुग्गीवासियों के पक्के मकानों, शौचालय, पानी और शिक्षा पर खर्च होता, तो देश को कुछ भी छिपाने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
‘गरीबी उन्मूलन या गरीबों का उन्मूलन?’ — नीतिगत विफलताओं पर प्रहार
विकास के बड़े-बड़े दावों और ‘विश्वगुरु’ बनने की आकांक्षाओं के बीच यह प्रशासनिक व्यवस्था का एक कड़वा और नग्न सच है:
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छलावे की कूटनीति: दुनिया के सामने देश की चमचमाती तस्वीर पेश करने की होड़ में हम अपने ही देश के सबसे कमजोर और गरीब तबके की मौजूदगी को नजरअंदाज करने का प्रयास करते हैं।
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सहानुभूति का अभाव: नीति-निर्माता यह भूल जाते हैं कि पर्दे लगाने से किसी भूखे पेट का दर्द कम नहीं होता और न ही कागजी आंकड़ों से गरीबी मिटती है।
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संवैधानिक अधिकारों का हनन: हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। गरीबी कोई अपराध नहीं है जिसे विदेशी मेहमानों की नजरों से छुपाया जाए, बल्कि यह सरकारों की नीतिगत विफलताओं का आईना है।
‘ऑल राइट्स मैगजीन’ की बेबाक राय
‘ऑल राइट्स मैगजीन’ हमेशा से शोषितों, वंचितों और हाशिए पर खड़े अंतिम व्यक्ति की आवाज बनती रही है। सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि भारत की असली ताकत उसकी कमियों को छिपाने में नहीं, बल्कि उन्हें स्वीकार करके ईमानदारी से दूर करने में है।
जब तक नीतिगत फैसले ‘पर्दा लगाने’ की जगह ‘गरीबी हटाने’ पर केंद्रित नहीं होंगे, तब तक चकाचौंध से भरी मुख्य सड़कों के ठीक पीछे एक भूखा, बेबस और अधिकारों के लिए तरसता भारत यूं ही खड़ा रहेगा।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)
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