इतिहास और साहित्य का आत्मीय रिश्ता

बिहार: “इतिहास और साहित्य का रिश्ता आत्मीय और जटिल” : प्रो. कमलानंद झा

रिपोर्ट: आशीष रंजन

दरभंगा, बिहार: ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग द्वारा बुधवार को “इतिहास और साहित्य का अन्तर्संबंध” विषय पर एक विशेष एकल व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस बौद्धिक परिचर्चा में शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने इतिहास और साहित्य के गहरे जुड़ाव पर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के लब्धप्रतिष्ठ प्राध्यापक प्रो. कमलानंद झा रहे। उन्होंने अपने व्याख्यान में इतिहास लेखन के बदलते आयामों और उसमें साहित्य की भूमिका को प्रमुखता से रेखांकित किया।

जन-सामान्य का भी होना चाहिए इतिहास: प्रो. कमलानंद झा

प्रो. कमलानंद झा ने औपनिवेशिक ऐतिहासिक दृष्टि की सीमाओं और साहित्य पर उसके पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों की विस्तृत चर्चा की। उन्होंने अपने संबोधन में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें कहीं:

  • नव्य इतिहास शास्त्र: 90 के दशक में आई इतिहास की नई धारा ‘नव्य इतिहास शास्त्र’ साहित्य को इतिहास का दर्जा देती है।

  • हिस्ट्री फ्रॉम बिलो: इतिहास सिर्फ राजा-महाराजाओं और युद्धों का ही नहीं होना चाहिए, बल्कि ‘हिस्ट्री फ्रॉम बिलो’ (History from Below) के सिद्धांत के तहत इसमें जन-सामान्य और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का भी समावेश होना चाहिए।

  • कल्पना और सत्य का संतुलन: इतिहास और साहित्य का रिश्ता आत्मीय होने के साथ-साथ बेहद जटिल है। अधिकांश साहित्यकारों की ऐतिहासिक रचनाओं में कई बार कल्पना इतनी हावी हो जाती है कि वह न तो पूर्ण रूप से इतिहास रह पाता है और न ही बेहतर साहित्य बन पाता है।

  • विद्यापति की रचनाओं पर शोध की मांग: उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास को अंतर्विरोधों और अंतर्द्वंदों का इतिहास बताते हुए कहा कि महाकवि विद्यापति की ‘पुरुषपरीक्षा’, ‘लिखनावली’ एवं ‘कीर्तिलता’ जैसी कालजयी कृतियों पर अभी और गहन शोध किए जाने की आवश्यकता है।

इतिहास सत्य और स्रोत है, तो साहित्य कल्पनाशील: डॉ. अनिल कुमार चौधरी

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार चौधरी ने दोनों विधाओं के अन्योन्याश्रय संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इतिहास पूरी तरह से सत्य, तथ्य और साक्ष्यों पर आधारित होता है, जिसमें पुरातात्विक स्रोत सबसे अधिक प्रामाणिक माने जाते हैं। उन्होंने अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि तथ्यों की प्रचुरता के कारण इतिहास कभी-कभी नीरस हो सकता है, लेकिन साहित्य हमेशा कल्पनाशील, संवेदनशील और सरस होता है।

साहित्य बताता है कि क्या होना चाहिए: डॉ. आर. एन. चौरसिया

विषय प्रवेश कराते हुए संस्कृत-प्राध्यापक डॉ. आर. एन. चौरसिया ने कहा कि साहित्य समाज का अमूल्य दर्पण है और इतिहास यह तय करता है कि हमारा समाज किस सामाजिक ढांचे में ढल रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा:

“साहित्य के गहन अध्ययन के बिना किसी भी युग का मुकम्मल सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास नहीं लिखा जा सकता। इतिहास हमें बताता है कि अतीत में ‘क्या हुआ’, जबकि साहित्य हमें यह सीख देता है कि समाज में ‘क्या होना चाहिए’।”

एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं दोनों विधाएं

कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. लक्ष्मी कुमारी ने किया। व्याख्यान के अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कार्यक्रम के संयोजक डॉ. मनीष कुमार ने बेहद खूबसूरती से दोनों विधाओं को समेटते हुए कहा कि एक इतिहासकार किसी न्यायाधीश की तरह पूरी तरह से उपलब्ध तथ्यों पर निर्भर और तटस्थ होता है, जबकि एक साहित्यकार की प्रतिबद्धता मानवीय व भावात्मक सत्य के प्रति होती है। वास्तव में, ये दोनों एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं जो समाज को आगे बढ़ाते हैं।

इस गरिमामयी व्याख्यान में प्रो. उमेश कुमार, डॉ. बबीता कुमारी, डॉ. सुशील कुमार सुमन सहित 60 से अधिक प्राध्यापक, वरिष्ठ शोधार्थी और विद्यार्थी मुख्य रूप से उपस्थित रहे।


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