शास्त्री जयंती: ‘जय जवान, जय किसान’ के उद्घोषक लाल बहादुर शास्त्री को नमन
“लाल बहादुर शास्त्री जयंती: सादगी, ईमानदारी और ‘जय जवान, जय किसान’ के अमर नारे को देश का नमन”
नई दिल्ली: 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ-साथ देश अपने एक और महान सपूत और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर उनकी पावन स्मृति को नमन कर रहा है। शास्त्री जी एक ऐसे जननायक थे, जिन्होंने देश को केवल राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं दिया, बल्कि अपनी सादगी, अभेद्य सत्यनिष्ठा, नैतिक मूल्यों और दृढ़ इच्छाशक्ति से नेतृत्व की एक नई परिभाषा गढ़ी।
उनका ऐतिहासिक नारा ‘जय जवान, जय किसान’ केवल दो शब्दों का समूह नहीं, बल्कि भारत की सीमाओं की रक्षा करने वाले जांबाज जवानों और अन्नदाता किसानों के प्रति देश के सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक है, जो आज दशकों बाद भी हर भारतीय के दिल में गूंजता है।
सादगी और उच्च नैतिक मूल्यों की मिसाल
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का पूरा जीवन सादगी और शुचिता का अद्वितीय उदाहरण रहा है:
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1965 युद्ध में कुशल नेतृत्व: 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब देश खाद्य संकट और सीमा पर युद्ध की दोहरी चुनौतियों से जूझ रहा था, तब शास्त्री जी ने अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प के साथ देश का मार्गदर्शन किया।
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त्याग और सादगी: देश में खाद्यान्न संकट के समय उन्होंने खुद और अपने परिवार के लिए एक समय का उपवास रखकर देशवासियों को ‘शास्त्री व्रत’ का आह्वान किया था, जिसे पूरे देश ने सहर्ष अपनाया।
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नैतिकता की अद्वितीय मिसाल: रेल मंत्री रहते हुए एक ट्रेन दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दे देना उनके उस उच्च चरित्र को दर्शाता है, जिसकी मिसाल आज के दौर में दुर्लभ है।
‘जय जवान, जय किसान’ — आज भी प्रासंगिक
शास्त्री जी द्वारा दिया गया ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा आज भी भारत की सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की रीढ़ बना हुआ है। सीमाओं पर तैनात सैनिकों का शौर्य और खेतों में पसीना बहाते किसानों का योगदान ही भारत को एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र बनाने का आधार है।
‘ऑल राइट्स मैगजीन’ भारत के इस महान सपूत, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर उनके अमर विचारों, अद्वितीय सादगी और राष्ट्र सेवा को कोटि-कोटि नमन करती है।
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