बिहार का सावन लोकगीत कजरी
सावन की फुहार और कजरी की तान- काले बादलों और झूलों के बीच क्यों गाया जाता है बिहार का ये खास लोकगीत
(लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली): बिहार की पावन लोक संस्कृति इतनी अद्भुत और समृद्ध है कि यहाँ जीवन के हर रंग के लिए गीत बने हैं [cite: लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार की लोक संस्कृति इतनी समृद्ध है कि यहां बच्चे के जन्म, शादी, त्योहार और यहां तक कि हर मौसम के लिए खास लोकगीत बने हैं।]। चाहे बच्चे का जन्म हो, विवाह का शुभ अवसर हो, कोई बड़ा त्योहार हो या फिर बदलता मौसम—हर पल को उत्सव में बदलने के लिए यहाँ के लोकगीतों का कोई सानी नहीं है [cite: लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार की लोक संस्कृति इतनी समृद्ध है कि यहां बच्चे के जन्म, शादी, त्योहार और यहां तक कि हर मौसम के लिए खास लोकगीत बने हैं।]।
जिस तरह चैत्र के महीने में ‘चैती’ गाकर प्रकृति का आभार जताया जाता है, ठीक उसी तरह जब तपती और झुलसाती गर्मी के बाद आसमान में काले-घने बादल घिर आते हैं और रिमझिम फुहारें धरती की प्यास बुझाती हैं, तब बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में ‘कजरी’ की मधुर तान गूंजने लगती है [cite: जैसे चैत्र महीने में चैती गाते हैं, इसी तरह जब तपती गर्मी के बाद जब आसमान में काले बादल घिर आते हैं और सावन की पहली फुहार धरती को भिगोती है, तब बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश गांवों में कजरी की तान गूंजती है।]।
सावन के स्वागत का पारंपरिक राग है ‘कजरी’
कजरी केवल एक गीत नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति प्रेम, विरह और उल्लास की अभिव्यक्ति है:
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मौसम का उत्सव: कजरी मुख्य रूप से सावन के महीने में गाया जाने वाला एक बेहद खास और पारंपरिक लोकगीत है।
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भौगोलिक पहचान: यह लोकगीत मुख्य रूप से बिहार और उससे सटे पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में बेहद चाव से गाया और सुना जाता है [cite: सावन के स्वागत के लिए बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में कजरी गाई जाती है।, यह बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में गाया जाता है]। यह गीत यहाँ की मिट्टी और संस्कृति में पूरी तरह रचा-बसा हुआ है।
काले बादलों, झूलों और महिलाओं का अनूठा संगम
सावन के महीने में जब बागों में झूले पड़ते हैं, तो कजरी का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं और नवविवाहिताएं एक साथ मिलकर, टोलियां बनाकर इस लोकगीत को गाती हैं।
कजरी के गीतों में अक्सर बादलों का गरजना, बिजली का चमकना, पपीहे की पी-पी, झूलों का आनंद और अपने पिया (पति) से मिलन या उनके परदेस जाने का विरह साफ झलकता है। सावन की फुहारों के बीच जब महिलाएं ऊंचे झूलों की पींगों के साथ कजरी की तान छेड़ती हैं, तो पूरा माहौल उमंग और जीवंतता से भर उठता है। यही कारण है कि सदियों बाद भी आधुनिकता के दौर में बिहार का यह लोकगीत आज भी अपनी जड़ों को मजबूती से थामे हुए है।
(गोपाल चन्द्र अग्रवाल,संपादक)
एडिटर (Allrights Magazine)

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