भारत का बढ़ता कर्ज: विकास या जोखिम?
भारत के बढ़ते कर्ज का सच: विकास की जरूरत या आर्थिक जोखिम? विश्लेषण
हाल के वर्षों में भारत का कुल सार्वजनिक कर्ज (Public Debt) तेजी से बढ़ा है। जहां एक तरफ इसे बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के विकास और आर्थिक रफ्तार देने की अनिवार्यता बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग इसे भविष्य के लिए जोखिम मान रहा है।
क्या यह कर्ज विकास के लिए लिया जा रहा है या देश कर्ज के जाल में फंस रहा है? आइए इसके दोनों पक्षों को समझें:
1. कर्ज क्यों बढ़ रहा है? (सकारात्मक पहलू)
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कैपेक्स (Capex) और बुनियादी ढांचा: सरकार हाईवे, रेलवे, एक्सप्रेसवे और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण (Capital Expenditure) पर रिकॉर्ड खर्च कर रही है। यह खर्च दीर्घकालिक आर्थिक उत्पादकता को बढ़ाता है।
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आंतरिक कर्ज की मजबूती: भारत का अधिकांश कर्ज (लगभग 95%) घरेलू बाजार और भारतीय रुपयों में है, न कि विदेशी मुद्रा में। इससे श्रीलंका या पाकिस्तान जैसी स्थिति (विदेशी कर्ज संकट) का जोखिम नगण्य हो जाता है।
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जीडीपी के अनुपात में नियंत्रण: केंद्र सरकार का ऋण-से-जीडीपी अनुपात घटाकर लगभग 55.6% के स्तर पर लाने और राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को नियंत्रित करने का लक्ष्य रखा गया है।
2. चिंता के मुख्य बिंदु (जोखिम भरा पहलू)
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ब्याज भुगतान का बोझ: बजट का लगभग 26% हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में चला जाता है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण जैसी योजनाओं के लिए फंड कम हो जाता है।
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राज्यों पर कर्ज का दबाव: केंद्र के अलावा कई राज्य सरकारों का कर्ज-जीडीपी अनुपात भी चिंताजनक स्तर पर पहुंच रहा है।
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कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च: इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ लोक-लुभावन (Freebies) योजनाओं पर भी बड़ा कर्ज लिया जा रहा है, जिससे प्रत्यक्ष आय का सृजन नहीं होता।
निष्कर्ष
कर्ज अपने आप में बुरा नहीं है यदि उसका उपयोग उत्पादक संपत्तियों (Productive Assets) के निर्माण में हो। भारत का कर्ज वृद्धि की गति से जुड़ा हुआ है, लेकिन यदि विकास दर धीमी पड़ती है या ब्याज का बोझ अत्यधिक बढ़ता है, तो यह भावी पीढ़ियों और अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)

