स्वदेशी के नाम पर भावनात्मक ब्लैकमेलिंग ?

चरक एवं पतंजलि जैसे महर्षियों के देश भारतवर्ष में आयुर्वेद से संबंधित जड़ी-बूटियों तथा दवाईयों का प्रयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है। यहां तक कि रामायण में भी वह प्रसंग बहुचर्चित है जबकि लक्ष्मण के मूर्छित होने पर हनुमान जी संजीवनी नामक बूटी लेकर आए थे तथा लक्ष्मण को उसी संजीवनी से स्वास्थ्य लाभ हुआ था। उस समय से लेकर अब तक भारत में जड़ी-बूटियों तथा आयुर्वेद का एक बहुत बड़ा बाज़ार बना हुआ है। आज हमारे देश में छोटे-बड़े  सैकड़ों ऐसे उद्योग हैं जो जड़ी-बूटियों के द्वारा आयुर्वेदिक दवाईयों का उत्पादन करते हैं। स्वर्गीय श्री एस के बर्मन द्वारा 1884 में स्थापित की गई देश की सबसे प्रतिष्ठित डाबर आयुर्वेदिक कंपनी का नाम देश या दुनिया में कौन नहीं जानता? इसके पश्चात हमदर्द के नाम से 1906 में एकआयुर्वेदिक दवाईयों पर आधारित ट्रस्ट की स्थापना दिल्ली में की गई जो बिना किसी लाभ-हानि की शर्तों पर अनेकानेक आयुर्वेदिक दवाईयों का उत्पादन करता आ रहा है। झंडु रियल्टी लिमिटेड की स्थापना 1910 में की गई थी। यह भी एक भारतीय प्रतिष्ठित आयुर्वेद कंपनी है। इसी प्रकार पंडित रामदयाल जोशी ने वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन प्राईवेट लिमटेड नामक कंपनी की स्थापना 1918 में की। यहां भी पूर्ण रूप से वैज्ञानिक पद्धतियों से उच्च गुणवत्ता की दवाईयों का उत्पादन होता है। इस कंपनी के पास भारत सरकार द्वारा स्वीकृत शोध केंद्र हैं जहां उच्चकोटि के योग्य वैज्ञानिकों की टीम काम करती है। वैद्यनाथ की विश्वसनीयता को आयुर्वेद जगत में इस बात से भी समझा जा सकता है कि आयुर्वेद पर आधारित वैद्यनाथ से प्रकाशित होने वाली पुस्तकें देश के आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल की जाती हंै।

परंतु जब से बाबा रामदेव व उनके सहयोग नेपाली मूल के बाल कृष्ण ने 2006 में अर्थात् मात्र ग्यारह वर्ष पूर्व पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड की स्थापना की तब से देश के विभिन्न मीडिया माध्यमों द्वारा ऐसा प्रचारित किया जाने लगा गोया देश में आयुर्वेद की शुरुआत करने वाले तथा इस क्षेत्र में क्रांति लाने वाले चमत्कारी व्यक्ति बाबा रामदेव तथा बालकृष्ण ही हैं। इसमें कोई शक नहीं कि बाबा रामदेव ने बड़ी ही चतुराई के साथ अपने-आप को देश की जनता से एक योगाचार्य के रूप में परिचित कराया। इसमें भी कोई शक नहीं कि वे हमारे देश की भोली-भाली जनता की कमज़ोरियों तथा उसकी नब्ज़ को भलीभांति पहचानते हैं। दूसरी ओर उनके साथ भारतीय निवेशकों की एक बड़ी व्यवसायिक टीम भी जुड़ी हुई है। अपनी प्रसिद्धि तथा लोकप्रियता को शिखर तक ले जाने में और देश की जनता को यह समझाने में कि वे वास्तव में देश के स्वाभिमान के प्रति सजग व चिंतित रहते हैं, उन्होंने यूपीए सरकार के शासनकाल में विदेशों से काला धन वापस लाने की एक ऐसी मुहिम छेड़ी जो भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान सरकार आने के बाद कुछ इस तरह पर्दे के पीछे चली गई गोया रामदेव ने कभी इस प्रश्र को उठाया ही न हो। नतीजतन इन दिनों केंद्र तथा विभिन्न राज्यों की सरकारों के संरक्षण में रामदेव के पतंजलि उद्योग का कारोबार दिन दूनी-रात चौगुनी की दर से बढ़ता जा रहा है। यहां तक कि अब वे आयुर्वेद के अलावा उन क्षेत्रों में भी उतरने जा रहे हैं जिनके लिए भारतवर्ष उन्हें एक बड़ा बाज़ार दिखाई दे रहा है। जैसे कि खबरों के अनुसार वे जींस के कारोबार में उतरने जा रहे हैं। पिछले दिनों तो यह खबर भी आई कि रामदेव पराक्रम सुरक्षा प्राईवेट लिमिटेड के नाम से एक सिक्योरिटी गार्डस की कंपनी भी खोलने जा रहे हैं।

 

पतंजलि उत्पादों के अतिरिक्त यहां की आयुर्वेद दवाओं के 18 नमूने भी गुणवत्ता के मापदंड पर पूरे नहीं उतरे। इनमें अविपटटिका चूर्ण,तालिस्दाय चूर्ण, पुष्पयेनुगा चूर्ण,लवण भास्कर चूर्ण,योगराज गुगुल,लक्ष्य गुगुल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। पतंजलि के उत्पादों को भारतीय सेना अथवा यहां की विभिन्न प्रयोगशालाओं द्वारा ही खारिज नहीं किया गया बल्कि नेपाल जैसे पड़ोस के छोटे से देश ने भी इनके विभिन्न उत्पादों को न केवल खारिज कर दिया बल्कि इन्हें बाज़ार से वापस लिए जाने का विज्ञापन भी जारी किया।

बावजूद इसके कि पतंजलि का कारोबार स्वदेशी, स्वाभिमान जैसी भावनाओं के प्रवाह में दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है परंतु इस बात को भी नजऱअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि पतंजलि के विभिन्न उत्पादों के बारे में तरह-तरह के नकारात्मक परिणाम भी सामने आते रहते हैं। इस तरह की रिपोर्टस पतंजलि की किसी प्रतिस्पर्धा करने वाली कंपनी या रामदेव के व्यक्तिगत् अथवा राजनैतिक आलोचकों द्वारा नहीं बल्कि देश के महत्वपूर्ण संस्थानों द्वारा उजागर की जाती हैं। मिसाल के तौर पर पतंजलि का एक प्रमुख उत्पाद पतंजलि आंवला स्वरस अथवा आवंला जूस भारतीय सेना द्वारा अपनी सभी कैंटीन में बेचने हेतु निलंबित कर दिया गया। क्योंकि प्रयोगशाला के परीक्षण में यह उत्पाद विफल साबित हुआ। रक्षा मंत्रालय ने परीक्षण में विफल पाए जाने के बाद पतंजलि को कारण बताओ नोटिस भी भेजा था। इसी प्रकार सूचना के अधिकार के माध्यम से मिली एक जानकारी के अनुसार पतंजलि के दिव्य आंवला रस तथा शिवलिंगी बीज गुणवत्ता के मानकों को पूरा करने में विफल रहे हैं और इन उत्पादों में 31.68 प्रतिशत विदेशी पदार्थ पाया गया। 2013-16 के मध्य पतंजलि के उत्पादों के एकत्रित किए गए 82 विभिन्न नमूनों में से 32 नमूने गुणवत्ता परीक्षण में विफल रहे। पतंजलि उत्पादों के अतिरिक्त यहां की आयुर्वेद दवाओं के 18 नमूने भी गुणवत्ता के मापदंड पर पूरे नहीं उतरे। इनमें अविपटटिका चूर्ण,तालिस्दाय चूर्ण, पुष्पयेनुगा चूर्ण,लवण भास्कर चूर्ण,योगराज गुगुल,लक्ष्य गुगुल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

पतंजलि के उत्पादों को भारतीय सेना अथवा यहां की विभिन्न प्रयोगशालाओं द्वारा ही खारिज नहीं किया गया बल्कि नेपाल जैसे पड़ोस के छोटे से देश ने भी इनके विभिन्न उत्पादों को न केवल खारिज कर दिया बल्कि इन्हें बाज़ार से वापस लिए जाने का विज्ञापन भी जारी किया। इनमें आंवला चूर्ण,दिव्य गाश्नर चूर्ण,बाकुचि चूर्ण,त्रिफला चूर्ण, अश्वगंधा चूर्ण,आदिव्य चूर्ण आदि दिव्य फार्मेसी,पतंजलि आयुर्वेदिक केंद्र द्वारा निर्मित दवाईयों के नाम प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त भी सोशल मीडिया पर तथा दूसरे मीडिया माध्यमों से कई बार यह पता चलता रहता है कि पतंजलि अथवा दिव्य फार्मेसी के विभिन्न उत्पाद किस प्रकार असुरक्षित तथा निर्धारित मापदंड को पूरा न कर पाने वाले प्रतीत होते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजि़मी है कि जब बाबा रामदेव द्वारा देश की जनता को स्वदेशी उत्पाद के प्रयोग का पाठ पढ़ाया जाता है और भावनात्मक रूप से उन्हें स्वदेशी सामग्रियों के प्रयोग के लिए आकर्षित किया जाता है ऐसे में क्या नेपाल जैसे देश में अथवा देश की सेना द्वारा सीएसडी कैंटीन में उनका उत्पाद खारिज किए जाने की स्थिति में देश के मान-सम्मान या स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचती? इसी संदर्भ में एक प्रश्र यह भी कि जिस स्वदेशी उत्पाद के प्रयोग के लिए रामदेव टेलीविजऩ चैनल्स पर करोड़ों रुपये रोज़ के विज्ञापन जारी कर रहे हैं उन उत्पादों को तैयार करने वाली सभी मशीनें क्या शत-प्रतिशत भारतीय मशीनरी उद्योग द्वारा निर्मित हैं? या फिर विदेशी मशीनों से ‘स्वेदशी उत्पाद’ तैयार कर भारतीय जनता को स्वदेश उत्पाद प्रयोग करने का पाठ पढ़ाया जा रहा है?

यदि आप बाबा रामदेव द्वारा प्रसारित किए जाने वाले विज्ञापनों पर गौर से नजऱ डालें तो वे यह भी बताने की पुरज़ोर कोशिश करते हैं कि पतंजलि के उत्पाद से पहले पूरा देश किसी भी कंपनी द्वारा निर्मित की हुई जो भी सामग्री प्रयोग मेंं ला रहा था वह नकली थी तथा उसके शरीर को नुकसान पहुंचाने वाली थी। यहां तक कि उन्होंने अपने एक विज्ञापन में तो देश के चिकित्सकों का भी यह कहकर अपमान किया था कि सफेद कोट पहनकर झूठ भी बोला जा सकता है। तो क्या यह पूछना गलत होगा कि काला धन विदेशों से वापस लाने के नाम पर बाबा रामदेव द्वारा लड़ी जा रही लड़ाई झूठ पर आधारित थी या सत्य पर? या फिर यह सबकुछ देश की भोली-भाली जनता में अपनी पैठ बनाने तथा स्वदेशी के नाम पर जनता को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने का एक सोचा-समझा तरीका मात्र था ?

 

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