प्रभाष प्रसंग में पत्रकारिता पर मंथन
गांधीवादी चिंतन और हिंदी पत्रकारिता पर मंथन: परस्पर प्रेम और संवाद से ही संभव है कौमी संवादिता
नई दिल्ली: राजघाट स्थित ‘गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति’ में रविवार को भव्य ‘प्रभाष प्रसंग 2026’ स्मारक व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस गरिमामयी कार्यक्रम में देश के बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और वरिष्ठ पत्रकारों ने कौमी संवादिता, गांधीवादी चिंतन, हिंदी पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप और सामाजिक समरसता जैसे ज्वलंत विषयों पर गहन मंथन किया।
इस 17वें प्रभाष प्रसंग के मंच पर केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, प्रख्यात गांधीवादी चिंतक डॉ. सुदर्शन अयंगर, और वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय व बनवारी सहित कई गणमान्य हस्तियां मौजूद रहीं。
भजनों की प्रस्तुति से भक्तिमय हुआ सभागार
कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ शास्त्रीय संगीत और भक्ति के सुंदर समागम से हुआ:
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कलापिनी कोमकली की गायकी: प्रख्यात शास्त्रीय गायिका सुश्री कलापिनी कोमकली ने अपनी सुरीली आवाज में कबीर के प्रसिद्ध भजनों की मनमोहक प्रस्तुति दी।
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भक्तिमय माहौल: उनके द्वारा गाए गए भजन ‘सुनता है गुरु ज्ञानी’, ‘अवधूत गगन घटा घहरानी’ और ‘बीत गए दिन भजन बिना रे’ ने पूरे सभागार को आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर दिया।
“संवाद और विश्वास से ही खुलेगी पूर्वाग्रहों की गांठ”
‘कौमी संवादिता की मधुशाला’ विषय पर मुख्य व्याख्यान देते हुए गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति डॉ. सुदर्शन अयंगर ने समाज को जोड़ने का संदेश दिया:
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शांति का मूल मंत्र: डॉ. अयंगर ने कहा कि समाज में स्थायी शांति और सौहार्द केवल परस्पर संवाद, अटूट विश्वास और वैचारिक साहस से ही स्थापित हो सकते हैं।
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पूर्वाग्रहों का अंत: गरुड़ पुराण और ईशावास्य उपनिषद का संदर्भ देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि महात्मा गांधी ने ‘कौम’ को जोड़ने को ही अपना मुख्य माध्यम बनाया था। हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच सदियों से मौजूद पूर्वाग्रहों की गांठ को केवल निरंतर संवाद से ही खोला जा सकता है। उन्होंने गांधी जी की ‘शांति सेना’ का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक समरसता सभी को साथ लेकर चलने से ही संभव है।
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष: ‘युगधर्म’ पर विमर्श
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने हिंदी मीडिया के वर्तमान परिदृश्य पर अपनी चिंता व्यक्त की:
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उपेक्षा पर खेद: श्री राय ने कहा कि यह ऐतिहासिक वर्ष हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली 200 वर्ष पूरे होने का साक्षी है, लेकिन दुर्भाग्यवश आज के हिंदी मीडिया ने इस ऐतिहासिक अवसर को वह उचित महत्व नहीं दिया जो मिलना चाहिए था।
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प्रभाष जोशी को किया याद: उन्होंने महान पत्रकार प्रभाष जोशी को याद करते हुए कहा कि यदि वे आज जीवित होते, तो हिंदी पत्रकारिता के युगधर्म पर एक व्यापक देशव्यापी विमर्श खड़ा कर देते। उन्होंने प्रभाष जी के उस दौर के लोकप्रिय आग्रह—‘जनसत्ता मिल-बांटकर पढ़िए’ को भी साझा किया。
मुख्य अतिथि और अध्यक्षीय संबोधन
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केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल: मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि प्रेम समाज को आपस में जोड़ने वाली सबसे बड़ी और अचूक शक्ति है। परस्पर प्रेम की बदौलत ही समाज में ‘मोहब्बत की पाठशाला’ चलती है। उन्होंने संत मीरा को प्रेम की सर्वोच्च साधिका बताया और कबीर की निर्वाण स्थली मगहर में प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हुए अभूतपूर्व विकास कार्यों की चर्चा की।
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वरिष्ठ पत्रकार बनवारी (अध्यक्षीय वक्तव्य): कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार बनवारी ने कहा कि महात्मा गांधी का भारतीय समाज और उसकी चेतना पर अटूट विश्वास था। तमाम विविधताओं के बीच एक साथ रहने और सह-अस्तित्व की अनूठी क्षमता ही भारतीय समाज की असली ताकत है।
‘पत्रकारिता का युगधर्म’ पुस्तक का विमोचन
कार्यक्रम की भूमिका व प्रस्तावना जनसत्ता के पूर्व पत्रकार मनोज मिश्रा ने प्रस्तुत की। इस ऐतिहासिक अवसर पर हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में प्रभाष जोशी के चुनिंदा लेखों के अनमोल संकलन ‘पत्रकारिता का युगधर्म’ और स्मारक व्याख्यान पुस्तिका का विधिवत लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. अशोक कुमार गाड़िया ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। समारोह के दौरान हेमंत शर्मा द्वारा संपादित प्रभाष जोशी के पत्रकारिता जीवन पर आधारित एक प्रेरणादायक वृत्तचित्र (Documentary) भी प्रदर्शित किया गया।
इस व्याख्यान माला में डॉ. सचिदानंद जोशी, सांसद राधेमोहन सिंह, प्रताप सोमवंशी, राकेश सिंह, संदीप जोशी, सोपान जोशी, श्रुति अवस्थी सहित दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के पत्रकारिता विभाग के तमाम छात्र-छात्राएं व शोधार्थी उपस्थित रहे।
रिपोर्ट: आशीष रंजन, वरिष्ठ पत्रकार
- (गोपाल चन्द्र अग्रवाल,संपादक)
- (एडिटर (Allrights Magazine)

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