बदहाल पाकिस्तान का क्या होगा?

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पाकिस्तान के हालात जितने ज्यादा बिगड़ेंगे भारत के लिए भी उतनी मुसीबत बढ़ जाएगी. ऐसा क्यों, ऐसा इसलिए क्योंकि अगर पड़ोसी देश कमजोर होता है तो दुश्मन देश उसका फायदा उठा सकते हैं और यह काम पाक की आड़ में चाइना कर ही रहा है,

इसी तरह, चीन-पाकिस्तान-इकनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) को लेकर पाकिस्तान के सपने का पूरा होना आसान नहीं लग रहा है और यहां तक कि चीन भी सीपीईसी पर एक्जिक्यूशन को लेकर परेशान है। हालात खराब हैं और पाकिस्तान का संकट 2018 में बढ़ सकता है।

भारत रणनीति के तौर पर पाकिस्तान के साथ कम से कम संपर्क रखे हुए है। अगर गुजरात के आखिर चरण के चुनाव प्रचार का मामला छोड़ दें, तो भारत पठानकोट एयर बेस पर हुए हमले के बाद पाकिस्तान को सुर्खियां बनने से रोकने में सफल रहा है।

आलोचक मानते हैं कि पाकिस्तान 2017 में भी संकटग्रस्त रहा। राजधानी में कट्टरपंथियों के उपद्रव को देखते हुए यह दलील सही लगती है। कट्टरपंथियों की मांगों के आगे सरकार ने समर्पण कर दिया और तभी इस संकट का हल निकला। पूर्व भारतीय राजनयिक सुभाष कपिला ने साउथ एशिया अनैलेसिस ग्रुप में पाकिस्तान को लेकर अपने हालिया लेख में कहा है, ‘पाकिस्तान की मौजूदा छवि एक अराजक देश की है, जो मध्ययुगीन इस्लाम की कुरीतियों में फंसा है।

यह पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना द्वारा इस देश के लिए देखे गए ख्वाब के बिल्कुल उलट है। पाकिस्तान का उदारवादी और पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग पाकिस्तानी सेना-मुल्लाओं के गठजोड़ के आगे बेबस है। पाकिस्तानी सेना और वहां के मुल्ला दोनों का इरादा पाकिस्तान को नेशन स्टेट बनाना (बहुसंख्यकों के दबदबे वाला देश) है।’

पाकिस्तानी सेना ने ट्रंप प्रशासन की कोशिशों को नाकाम करते हुए न सिर्फ लश्कर-ए-तैयबा के चीफ हाफिज सईद को हिरासत से छुड़ाया, बल्कि उसे अपनी राजनीति को वैध रूप प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित भी किया। चरमपंथ न सिर्फ पाकिस्तान में मौजूद है, बल्कि यह इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।
पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट की तरह ही घातक और खतरनाक हैं, जिनके सदस्य अपने मूल देश लौट रहे हैं।

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