हिंदी पत्रकारिता के 200 साल प्रो संजय द्विवेदी
विमर्श: हिंदी पत्रकारिता के 200 साल और भाषा के भविष्य की चुनौती—प्रो. संजय द्विवेदी; गंभीर अकादमिक विमर्श की भाषा बने बिना टिकाऊ होना कठिन
हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी (200 वर्ष) पूरे होने के इस ऐतिहासिक अवसर पर देशभर में समारोहों की धूम मची हुई है। दिल्ली, भोपाल, जयपुर, कोलकाता, रायपुर से लेकर कानपुर तक के अनेक प्रमुख शहरों और विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता विभागों में विमर्श, संवाद और बौद्धिक सम्मेलनों के अनेक गरिमामयी आयोजन हो रहे हैं। यह देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज वैश्विक पटल पर हिंदी का गौरव और आत्मविश्वास दोनों बहुत तेजी से बढ़ा है। आज हिंदी की लोकस्वीकृति सर्वव्यापी हो चुकी है; वह भारत में मीडिया, मनोरंजन जगत और राजनीतिक दलों के लिए वोट मांगने की सबसे बड़ी और प्रभावी भाषा बनकर उभरी है।
राजनीतिक संचार के क्षेत्र में तो हिंदी का दबदबा हमेशा से था, लेकिन देश के ताकतवर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे शीर्ष नेताओं की केंद्रीय उपस्थिति के चलते अब यह देश की सत्ता और शासन की भी मुख्य भाषा बन गई है। जनभाषा तो यह पहले से ही थी, लेकिन आज यह देश के नीति-नियंताओं की भी प्रिय भाषा है। जाहिर है, ऐसे दौर में हिंदी मीडिया का अपना एक अलग और भव्य जलवा होना स्वाभाविक है।
गंभीर यक्ष प्रश्न: क्या हमारी भाषा भविष्य में बचेगी?
पत्रकारिता के 200 साल पूरे होने का जश्न मनाते हुए मन में कई गंभीर सवाल भी हिलोरें मार रहे हैं। राजनीतिक बदलावों के कारण हिंदी की ताकत और वैभव आज चारों तरफ साफ दिखाई दे रहा है, लेकिन हमें उन बुनियादी सवालों की गहराई में भी उतरना होगा, जिससे हमारी पत्रकारिता और मुख्यधारा के मीडिया को असल आंतरिक शक्ति मिलती है।
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युवा पीढ़ी की सहजता: पत्रकारिता को प्राणवायु देने वाली पहली और सबसे बड़ी ताकत ‘भाषा’ ही है। क्या हमारी आने वाली नई पीढ़ी हिंदी के साथ उतनी ही सहज है, जितनी पुरानी पीढ़ी थी? क्या आज के बच्चों का पढ़ना, लिखना, समझना और बोलना वास्तविक रूप से हिंदी में हो रहा है?
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अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव: हकीकत यह है कि हमारी शिक्षा का माध्यम अब धीरे-धीरे पूरी तरह अंग्रेजी की तरफ शिफ्ट होता जा रहा है। ऐसे संक्रमण काल और कठिन समय में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के सामने अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने की एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी है।
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अखबारों पर गहरा संकट: यदि भविष्य में हिंदी के गंभीर पाठक ही तैयार नहीं होंगे, तो हिंदी के प्रिंट मीडिया (अखबारों और पत्रिकाओं) का भविष्य क्या होगा? आज हिंदी धीरे-धीरे सिर्फ ‘सुनी जाने वाली भाषा’ में तब्दील हो रही है, जिसके कारण इसके गंभीर अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं और अन्य वैचारिक माध्यमों के सामने एक गहरा संकट खड़ा हो गया है।
मनोरंजन और प्रचार से आगे: अकादमिक विमर्श की भाषा बनने की चुनौती
वर्तमान में हिंदी का सबसे बड़ा और व्यापक उपयोग केवल मनोरंजन, राजनीतिक संवाद, चुनाव या बाजार के विज्ञापनों तक ही सीमित होकर रह गया है।
“जब तक हिंदी गंभीर अकादमिक विमर्श और उच्च शोध की भाषा नहीं बनेगी, तब तक इसे लंबे समय तक एक सशक्त माध्यम के रूप में टिकाए रखना बेहद कठिन होगा। यह जनसंचार की सबसे लोकप्रिय भाषा तो हो सकती है, लेकिन ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा और हर बड़े अनुशासन की भाषा बने बिना इसे वैश्विक स्तर पर वह सम्मान और महत्व कभी नहीं मिल सकता, जो दुनिया की अन्य ताकतवर और समृद्ध भाषाओं को मिल रहा है।”
मीडिया का स्वभाव हमेशा से लोकप्रियता को साधने का रहा है, वह सबसे संवाद करता है, मनोरंजन परोसता है और सूचनाएं देता है। लेकिन भाषा के कई अन्य शास्त्रीय रूप भी होते हैं, जहां भाषा को खुद को बौद्धिक रूप से साबित करना होता है। आज हिंदी में गंभीर और वैचारिक प्रकाशनों की हालत बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। हिंदी आज गहरे विमर्श की नहीं, बल्कि ‘प्रचार और लोक-लुभावन’ विधा की भाषा ज्यादा बनकर रह गई है।
कम पाठक संख्या होने के बावजूद जिस प्रकार के गंभीर, खोजी और विश्लेषणात्मक अखबार व मैग्जीन्स आज भी अंग्रेजी भाषा के पास मौजूद हैं, वैसा बौद्धिक ढांचा हिंदी के पास दिखाई नहीं देता। हिंदी आज एक ऐसे ‘वैचारिक दारिद्र्य’ से जूझ रही है, जिसके पास एक बेहद गौरवशाली अतीत और अपार आत्मविश्वास तो है, लेकिन वैचारिक गहराई दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। हम केवल लोकप्रियता को साधने वाली सतही पत्रकारिता तक सीमित हो रहे हैं, जिससे गंभीर अनुसंधान, जमीनी सरोकार और माटी की सुगंध लगातार गायब होती जा रही है।
आधुनिक दौर की सबसे बड़ी चुनौती: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से जूझती भाषा
तकनीक के इस आधुनिक दौर में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, भाषाएं बहुत तेजी से मशीनीकृत हो रही हैं। ऐसे में सबसे बड़ा डर यह है कि हिंदी अपना मूल रूप, रस, गंध और स्वाभाविक आस्वाद कहीं गंवा न दे।
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एआई पर अत्यधिक निर्भरता: वर्तमान समय में तमाम मीडिया माध्यमों की एआई पर लगातार बढ़ती जा रही निर्भरता भाषा की मूल आत्मा के साथ एक बड़े खिलवाड़ जैसा ही है।
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मशीनी भाषा की सीमाएं: एआई जब मशीनी और तकनीकी इस्तेमाल से आगे बढ़कर इंसानी भाषा लिखने की ओर कदम बढ़ा रही है, तो उसकी बौद्धिक और भावनापरक सीमाएं बिल्कुल साफ नजर आती हैं।
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स्वाभाविक विकास का अवरुद्ध होना: किसी भी समाज में भाषा का फलना-फूलना, जीवित रहना और विकसित होना एक बेहद सहज और स्वाभाविक मानवीय प्रक्रिया है। लेकिन मशीनों द्वारा कृत्रिम रूप से गढ़ी और परोसी जा रही यह भाषा भविष्य में क्या विकृत रूप लेगी, इसके बारे में आज कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता।
सबसे बड़ी चिंता भाषा के इसी अस्तित्व को लेकर है, क्योंकि यदि भाषा ही अपनी शुद्धता और मौलिकता खो देगी, तो भाषा पर आधारित अन्य सभी मानवीय विधाएं—जिनमें पत्रकारिता भी एक प्रमुख अंग है—वे खुद को कैसे बचा पाएंगी?
ऐसे कठिन और चुनौतीपूर्ण समय में, जब मीडिया जगत में नैतिक मूल्यबोध और भाषा की शुचिता जैसे गंभीर सवाल लोगों को बेमानी और अप्रासंगिक लगने लगे हों, तब इस विधा में पूरी ईमानदारी और गंभीरता के साथ काम करने वाले कलमकारों की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। आज स्कूलों से लेकर पूरे उच्च अकादमिक जगत में हिंदी लगभग एक बहिष्कृत और दोयम दर्जे की भाषा बनकर रह गई है। क्या आने वाले दिनों में हिंदी सिर्फ आपसी बातचीत और बोलने की भाषा बनकर रह जाएगी, जैसी वह सदियों पहले थी?
हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे यशस्वी संपादकों बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, सखाराम गणेश देउस्कर और माधवराव सप्रे जैसे महान नायकों और मनीषियों की संपादन साधना की बदौलत ही हिंदी पत्रकारिता आज विकास के इस मुकाम तक पहुंची है। समाज में अलग-अलग स्तरों पर बरती और संवारी जा रही इस भाषा ने इन्हीं संपादकों के प्रयासों से एक कड़ा अनुशासन और व्याकरण पाया, जिसके बाद यह एक शानदार और धारदार गद्य की भाषा बन सकी। हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा संपादकों का यह ऐतिहासिक योगदान अतुलनीय है कि कैसे उन्होंने संघर्षों के बीच एक बेहद समृद्ध भाषा तराशकर हमें विरासत के रूप में सौंपी। यह ऐसी भाषा बनी, जो सिर्फ साहित्य सृजन की भाषा नहीं थी, बल्कि समाज-जीवन के विविध वैज्ञानिक और व्यावहारिक अनुशासनों को पूरी प्रखरता के साथ व्यक्त करने का सामर्थ्य रखती थी। पत्रकारिता के इतिहास में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’, ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘प्रभा’ और ‘कल्पना’ जैसी कालजयी पत्रिकाओं ने जो वैचारिक क्रांति की, उसकी मिसाल पूरी दुनिया में कहीं खोजने पर भी नहीं मिलेगी। भाषा को उसका असली आत्मविश्वास और सामर्थ्य हिंदी पत्रकारिता ने ही पहली बार महसूस कराया था।
संकल्प से ही मिलेगी सिद्धि: अब जिम्मेदारी उठाने का समय
हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली 200 साल पूरे करने के बाद अब हम सभी को मीडिया और अकादमिक जगत के स्तर पर कुछ ठोस संकल्प लेने ही होंगे। पं. युगलकिशोर शुक्ल ने साल 1826 में ‘उदंत मार्त्तण्ड’ के रूप में हिंदी पत्रकारिता का जो पहला टिमटमाता दीप जलाया था, उसकी लौ को हमें हमेशा प्रज्ज्वलित और देदीप्यमान रखना है। यह हमारा नैतिक कर्तव्य भी है और हमें मिला हुआ अमूल्य उत्तराधिकार भी।
हम अपनी मातृभाषा को कैसे बचाएं और कैसे इसे हर आधुनिक अनुशासन (ज्ञान, विज्ञान, न्याय, प्रशासन) की मुख्य भाषा बनाएं, यह वैचारिक संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। अकादमिक जगत, प्रशासनिक गलियारों, देश की न्याय व्यवस्था, कॉरपोरेट वित्त और वैश्विक व्यवसाय तक विविध क्षेत्रों में हिंदी का प्रभावी हस्तक्षेप और उसकी मजबूत पैठ होना अभी भी शेष है। हिंदी और अन्य तमाम भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता आपस में समन्वय और एकजुटता बनाकर ही इस महान लक्ष्य को हासिल कर सकती हैं। इससे न केवल हमारे स्वत्व की पहचान होगी, बल्कि हमारा ‘भारतबोध’ भी वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रखर होगा। हमें अगर अपने देश के अंतिम व्यक्ति को उसका हक और न्याय दिलाना है, तो यह केवल और केवल उसकी अपनी मातृभाषा में ही संभव हो सकता है।
पश्चिमी और अंग्रेजी मानसिकता के ‘वैचारिक साम्राज्यवाद’ से मुक्ति हमें इन्हीं जमीनी प्रयासों से मिलेगी। यह सिर्फ कोई सामान्य भाषा-प्रेम या भावुकता का सवाल नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारतप्रेम और सामाजिक न्याय का एक बेहद संवेदनशील विषय है। अपनी समृद्ध लोक भाषाओं में बोलता, पढ़ता, सुनता और कुछ नया सीखता हुआ आत्मनिर्भर भारत अभी भी पूरी तरह से प्रतीक्षित है, जिसे हमें गढ़ना है।
इस पूरी प्रक्रिया में मीडिया की भूमिका सबसे बड़ी और निर्णायक है। हम सभी जानते हैं कि आज के इस आधुनिक युग में जिस आक्रामक तरह से मीडिया का तकनीकी विस्तार हुआ है, उसके चलते डिजिटल मीडिया के नाते भूगोल की तमाम रूढ़ सीमाएं पूरी तरह से टूट चुकी हैं। अब इस वैश्विक और डिजिटल बाजार में वही टिक पाएगा, जो गुणवत्ता और प्रामाणिकता के मामले में सबसे श्रेष्ठ होगा। इसलिए यह जरूरी है कि हम अपनी भाषा में श्रेष्ठतम और मौलिक सृजन करें। हिंदी को वैचारिक रूप से इतना ताकतवर और समृद्ध बनाएं कि दुनिया के ज्ञान-क्षेत्र में सक्रिय वैश्विक विचारक और शोधकर्ता हमारी हिंदी पत्रकारिता से संदर्भ (रेफरेंस) और प्रेरणा ग्रहण करें।
उधार के विचारों और दूसरों की जूठन पर आधारित लेखन या पत्रकारिता का समाज में कभी कोई स्थायी मूल्य नहीं होता। गंभीर ग्राउंड रिपोर्टिंग और निष्पक्ष, गहरा विश्लेषण ही आज के समय की सबसे मुख्य जरूरत है। इसी रास्ते पर चलकर ही वैश्विक पटल पर हमें एक मौलिक सृजनकर्ता के रूप में स्वीकार किया जाएगा। भारत का मूल विचार हमेशा से श्रेष्ठता का विचार रहा है, जो ‘विश्वमंगल’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना पर आधारित है। हमारी पत्रकारिता अगर इस महान सनातन विचार की संवाहक बन रही है, तो यह बात हमारे राष्ट्रीय संकल्पों को और अधिक दृढ़ करेगी। हिंदी पत्रकारिता के 200 साल पूरे होने की ऐतिहासिक बधाई देते हुए पूरे मीडिया जगत, संपादकों और युवा पत्रकारों से मेरा यही विनम्र आग्रह है कि वे हिंदी पत्रकारिता के इस ध्वज को केवल सनसनी के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी बौद्धिक गुणवत्ता, शुचिता और गहराई के आधार पर और ऊंचा ले जाएं।
(लेखक: प्रो. संजय द्विवेदी)
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,सीनियर एडिटर
(Allrights Magazine)

संपादकीय: भूने हुए धरतीवासी पूजा अनिल!
