सुप्रीम कोर्ट : ‘हिरासत में नहीं लिया’, ममता बनर्जी को

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया है कि 10 अक्तूबर को प्रदर्शन के दौरान ममता बनर्जी समेत किसी भी नेता को गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया गया। पुलिस के मुताबिक, निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने पर नेताओं को प्रदर्शन स्थल से हटाकर थाने ले जाया गया और बाद में जाने दिया गया। ऐसे में क्या ममता बनर्जी को हटाने के मामले में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका अब खारिज हो सकती है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं…

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि 10 अक्तूबर को दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान किसी को गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया गया था। इसी आधार पर पुलिस ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को प्रदर्शन स्थल से कथित तौर पर हटाए जाने के मामले में दायर याचिका को निष्प्रभावी बताया है। तृणमूल कांग्रेस की सांसद और वकील मेनका गुरुस्वामी ने यह याचिका दायर की थी। पुलिस का कहना है कि जब किसी व्यक्ति को हिरासत में ही नहीं लिया गया, तो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर आगे सुनवाई का कोई आधार नहीं बचता।

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?दिल्ली पुलिस की ओर से संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध) सुरेंद्र कुमार ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने जवाबी हलफनामा दाखिल किया।

पुलिस ने कहा कि याचिका बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हैबियस कॉर्पस के लिए दायर की गई थी। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को गैरकानूनी हिरासत से मुक्त कराना और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना है।

पुलिस के मुताबिक, 10 अक्तूबर को प्रदर्शन के दौरान किसी को गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया गया। इसलिए याचिका का उद्देश्य पूरा हो चुका है और अब यह सुनवाई योग्य नहीं रह गई है। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज करने की मांग की है।

प्रदर्शन की अनुमति नहीं लेने पर पुलिस ने क्या कहा?

दिल्ली पुलिस ने हलफनामे में कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने 10 अक्तूबर को प्रदर्शन का आह्वान किया था। इसके लिए संबंधित अधिकारी से अनुमति नहीं ली गई थी। पुलिस के मुताबिक, इस प्रदर्शन से इलाके की कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक शांति प्रभावित होने की आशंका थी। उस समय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। इस आदेश के उल्लंघन में किसी भी तरह की सभा या जमावड़े को गैरकानूनी बताया गया।

पुलिस ने कहा कि चाणक्यपुरी और साउथ एवेन्यू थाना क्षेत्रों में पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने, सार्वजनिक बैठक करने, बैनर-पोस्टर ले जाने, नारे लगाने, भाषण देने, जुलूस निकालने और प्रदर्शन करने पर रोक थी। यह आदेश सहायक पुलिस आयुक्त ने 19 अगस्त को जारी किया था। यह 20 अगस्त से 60 दिनों के लिए यानी 18 अक्तूबर तक प्रभावी था। पुलिस ने आदेश में राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास, विदेशी दूतावासों और अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की मौजूदगी का भी हवाला दिया।

ममता बनर्जी और अन्य नेताओं को कहां ले जाया गया था?

हलफनामे के अनुसार, 10 अक्तूबर को ममता बनर्जी, तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन, राज्यसभा सांसद डोला सेन और लोकसभा सांसद प्रतिमा मंडल समेत कुछ अन्य लोग साउथ एवेन्यू में धारा 163 के निर्देशों का उल्लंघन करते पाए गए। पुलिस का कहना है कि अधिकारियों ने उन्हें लागू प्रतिबंधों की जानकारी दी थी। इसके बावजूद जब उन्होंने निर्देशों का पालन नहीं किया, तो दोपहर करीब दो बजे उन्हें साउथ एवेन्यू से हटाकर द्वारका नॉर्थ पुलिस थाने ले जाया गया। वहां उन्हें थानाध्यक्ष के कक्ष में बैठने के लिए कहा गया। पुलिस ने दावा किया कि इस दौरान नेताओं के पद और सम्मान के अनुरूप व्यवहार किया गया। उन्हें चाय, कॉफी और खाना भी दिया गया।

पुलिस ने नेताओं को कब जाने की अनुमति दी?

दिल्ली पुलिस के मुताबिक, ममता बनर्जी, डोला सेन और प्रतिमा मंडल को शाम 5 बजकर 50 मिनट पर बताया गया कि वे वहां से जा सकती हैं, क्योंकि उन्हें साउथ एवेन्यू से हटाने की जरूरत पैदा करने वाली परिस्थितियां खत्म हो चुकी थीं। हालांकि, ये तीनों नेता डेरेक ओ ब्रायन, समीरुल इस्लाम और मोहम्मद नदीमुल हक के साथ जाना चाहते थे। पुलिस ने इन तीनों को शाम 6 बजकर 5 मिनट पर जाने की अनुमति दी। हलफनामे के अनुसार, सभी नेता अपनी-अपनी कारों से पुलिस थाने से रवाना हुए। पुलिस ने इस पूरी कार्रवाई को गिरफ्तारी या हिरासत नहीं, बल्कि कानूनी निर्देशों का पालन नहीं करने पर की गई कार्रवाई बताया है।

पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि याचिका मूल रूप से बंदी प्रत्यक्षीकरण के लिए दाखिल की गई थी। इसका मकसद कथित गैरकानूनी हिरासत से राहत पाना था। पुलिस के अनुसार, जब किसी को गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया गया और सभी नेताओं को जाने की अनुमति दे दी गई, तो याचिका का कोई उद्देश्य बाकी नहीं रह जाता। हलफनामे में यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने बाद में इसमें कई अतिरिक्त राहत की मांगें जोड़कर इसका दायरा बढ़ाने की कोशिश की। पुलिस का दावा है कि ऐसी अतिरिक्त मांगों पर इस तरह की कार्यवाही में सुनवाई नहीं की जा सकती। इसी आधार पर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका को निष्प्रभावी मानते हुए खारिज करने का अनुरोध किया है।

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