दक्षिण भारत की कांवड़ यात्रा: कावडी
उत्तर भारत ही नहीं, दक्षिण भारत में भी निकलती है ‘कांवड़ यात्रा’; जानें कैसे शिव पुत्र मुरुगन को समर्पित है ‘कावडी’
विशेष धर्म एवं संस्कृति ब्यूरो: नई दिल्ली
रिपोर्ट: धार्मिक ब्यूरो
हर साल सावन के पवित्र महीने में उत्तर भारत के राज्यों में कांवड़ यात्रा की भव्य छटा देखने को मिलती है। लाखों शिवभक्त (कांवड़िये) पवित्र नदियों से जल भरकर पैदल यात्रा करते हैं और शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उत्तर भारत की इस पारंपरिक कांवड़ यात्रा की तरह ही दक्षिण भारत में भी एक बेहद पवित्र और कठिन यात्रा निकाली जाती है, जिसे ‘कावडी’ (Kavadi) या ‘क्षत्रिस’ कहा जाता है।
हालाँकि, परंपरा और आस्था के इस रूप में उत्तर और दक्षिण भारत के बीच कुछ अनोखे और महत्वपूर्ण अंतर भी हैं।
दक्षिण भारत की ‘कावडी’ यात्रा उत्तर भारत से कैसे है अलग?
उत्तर और दक्षिण भारत की इन दोनों धार्मिक यात्राओं में मुख्य अंतर इनके आराध्य देव, अवसर और सजावट का है:
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आराध्य देव का अंतर: उत्तर भारत की कांवड़ यात्रा भगवान शिव को समर्पित होती है, जबकि दक्षिण भारत की ‘कावडी’ यात्रा भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय (जिन्हें दक्षिण भारत में ‘मुरुगन’ देवता के रूप में पूजा जाता है) को समर्पित है।
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पवित्र अवसर: उत्तर भारत में कांवड़ यात्रा सावन (श्रावण) के महीने में निकाली जाती है, वहीं दक्षिण भारत में यह प्रसिद्ध यात्रा तमिल कैलेंडर के अनुसार ‘थाईपुसम’ (Thaipusam) त्योहार के दौरान निकाली जाती है।
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कांवड़ की बनावट व सजावट: उत्तर भारत में बांस की बंहगी पर पानी से भरे कलश या मटके लटकाए जाते हैं। इसके विपरीत, दक्षिण भारत की ‘कावडी’ लकड़ी या बांस के ढांचे से बनी होती है, जिसे विशेष रूप से मोर पंखों, फूलों और धार्मिक वस्त्रों से बेहद खूबसूरती से सजाया जाता है।
कठिन साधना और अपार श्रद्धा का प्रतीक है ‘कावडी’
थाईपुसम उत्सव के दौरान भक्त बड़ी संख्या में अपने कंधों पर लकड़ी से सजी भारी कावडी (क्षत्रिस) उठाकर कई किलोमीटर पैदल चलते हैं। मान्यता है कि भगवान मुरुगन को प्रसन्न करने और अपनी मन्नतों की पूर्ति के लिए भक्त कठिन नियमों और संयम का पालन करते हुए इस यात्रा को पूरा करते हैं।
ऑल Rights मैगज़ीन (डिजिटल न्यूज़ नेटवर्क)
सीनियर एडिटर गोपाल चन्द्र अग्रवाल

