बरेली में शिक्षकों के कार्यों पर उठा सवाल

बरेली: सोशल मीडिया पर गरमाया शिक्षकों के सम्मान और कार्यप्रणाली का मुद्दा; सपा बनाम भाजपा के कार्यकाल को लेकर छिड़ी बहस

बरेली से मयंक शुक्ला

(बरेली): भारतीय संस्कृति में ‘गुरु’ यानी शिक्षक के स्थान को भगवान से भी ऊपर माना गया है, जैसा कि संत कबीरदास जी ने अपने प्रसिद्ध दोहे में कहा है:

“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।”

मगर वर्तमान समय में शिक्षकों की स्थिति, उनके सम्मान और उनसे शिक्षा के अलावा कराए जा रहे अन्य प्रशासनिक कार्यों को लेकर सोशल मीडिया पर एक नई राजनीतिक व सामाजिक बहस छिड़ गई है। बरेली से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर #education और #BareillyDevelopment जैसे हैशटैग के साथ जनता और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने मौजूदा सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल उठाए हैं, वहीं पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी सरकार के कार्यों की सराहना की जा रही है।

गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ पर नाराजगी

सोशल मीडिया पोस्ट्स के माध्यम से वर्तमान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के प्रति गहरी नाराजगी व्यक्त की जा रही है। जनता का आरोप है कि एक तरफ जहाँ देश की शिक्षा व्यवस्था की तुलना चीन और अमेरिका जैसे विकसित देशों से करने के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।

  • अतिरिक्त कार्यों का दबाव: आरोप है कि वर्तमान व्यवस्था में शिक्षकों से केवल शिक्षण कार्य कराने के बजाय भूसा प्रबंधन (जैसे प्रशासनिक/गौशाला संबंधी कार्यों) और अन्य तमाम गैर-शैक्षणिक कार्य कराए जा रहे हैं।

  • शिक्षा के स्तर पर असर: आलोचकों का कहना है कि शिक्षकों को पढ़ाई के मूल काम से दूर रखकर अन्य सरकारी योजनाओं और सर्वेक्षणों में व्यस्त रखना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, जिससे सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य प्रभावित हो रहा है।

अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल को किया याद

दूसरी तरफ, सोशल मीडिया यूज़र्स पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव के कार्यकाल की तुलना करते हुए उनके द्वारा शिक्षा और शिक्षकों के हित में किए गए कार्यों को रेखांकित कर रहे हैं:

  • शिक्षामित्रों का समायोजन: पोस्ट में विशेष रूप से जिक्र किया गया है कि अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली तत्कालीन सपा सरकार ने हजारों शिक्षामित्रों को समायोजित (Regularize) कर उन्हें मुख्यधारा में लाने का ऐतिहासिक कार्य किया था।

  • शिक्षक-हितैषी नीतियां: इसके अलावा शिक्षकों के वेतनमान, मानदेय और उनकी सेवा शर्तों को बेहतर बनाने के लिए किए गए प्रयासों को याद करते हुए सपा सरकार को शिक्षक-हितैषी बताया गया है।

इंटरनेट पर ट्रेंड कर रहा मुद्दा

शिक्षकों के साथ हो रहे इस कथित सौतेले व्यवहार को लेकर इंटरनेट पर #शिक्षक_विरोधी_भाजपा जैसे राजनीतिक आरोप भी लगाए जा रहे हैं। आम नागरिकों का कहना है कि जब तक शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से पूरी तरह मुक्त कर केवल पठन-पाठन पर ध्यान केंद्रित करने की आजादी नहीं मिलेगी, तब तक शिक्षा व्यवस्था में वैश्विक स्तर का सुधार संभव नहीं है।

फिलहाल, इन उठते सवालों पर शिक्षा विभाग या सत्ता पक्ष की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।


(गोपाल चन्द्र अग्रवाल,संपादक)

 एडिटर (Allrights Magazine)


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