पेट्रोल-डीजल टैक्स नीति पर उठे सवाल
बाहर तेल बेचने पर टैक्स में छूट, देश की जनता के लिए पुराना दाम; एक्सपोर्ट ड्यूटी घटने पर सरकार की नीतियों पर उठे सवाल
रिपोर्ट: विशेष ब्यूरो (नई दिल्ली)
(नई दिल्ली): देश में पेट्रोल, डीजल और हवाई ईंधन (ATF) पर टैक्स की नीतियों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस छिड़ गई है। शनिवार को सरकार द्वारा लिए गए एक हालिया फैसले के बाद यह आरोप लगाया जा रहा है कि सरकारी नीतियां आम जनता के बजाय बड़ी तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए तैयार की जा रही हैं। सरकार ने घरेलू स्तर पर उत्पादित कच्चे तेल और ईंधनों के निर्यात (Export) पर लगने वाली ड्यूटी को तो घटा दिया है, लेकिन घरेलू बाजार में आम उपभोक्ताओं को मिलने वाले पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई राहत नहीं दी है।
इस फैसले के बाद से सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में ‘टैक्स नीतियों’ को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
क्या है पूरा मामला? समझें टैक्स का गणित
सरकार की ओर से हर 15 दिनों में अंतर्राष्ट्रीय बाजार की समीक्षा की जाती है, जिसके आधार पर ‘विंडफॉल टैक्स’ (अतिरिक्त लाभ पर टैक्स) और एक्सपोर्ट ड्यूटी की दरों में बदलाव होता है।
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कंपनियों को राहत: हालिया समीक्षा के बाद तेल कंपनियों के लिए डीजल पर ₹13.5 प्रति लीटर और पेट्रोल पर ₹1.5 प्रति लीटर तक एक्सपोर्ट ड्यूटी घटा दी गई है। इससे तेल निर्यात करने वाली बड़ी कंपनियों का मुनाफा बढ़ना तय माना जा रहा है।
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जनता को कोई राहत नहीं: दूसरी तरफ, देश के भीतर आम नागरिकों, किसानों और मध्यम वर्ग को मिलने वाले पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले भारी-भरकम टैक्स या एक्साइज ड्यूटी में कोई कटौती नहीं की गई है। उपभोक्ताओं को अभी भी पुराने और महंगे दामों पर ही ईंधन खरीदना पड़ रहा है।
कच्चा तेल सस्ता होने पर भी घरेलू दाम जस के तस
नीतियों का विरोध कर रहे विश्लेषकों और नागरिकों का सीधा सवाल है कि जब भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) के दाम बढ़ते हैं, तो तेल कंपनियां तुरंत देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ा देती हैं। लेकिन जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होता है या कंपनियों का टैक्स घटाया जाता है, तो उस राहत का एक छोटा सा हिस्सा भी आम जनता की जेब तक क्यों नहीं पहुंचता?
“टैक्स वसूलने के लिए सरकार को हमेशा आम नागरिक और मध्यम वर्ग याद आता है, लेकिन जब राहत देने की बारी आती है, तो सारा फायदा सिर्फ बड़े कॉरपोरेट्स और निजी कंपनियों की तिजोरियों तक ही सीमित रह जाता है।”
सोशल मीडिया पर ‘टैक्स टेररिज्म’ के खिलाफ फूटा गुस्सा
सरकार के इस फैसले के बाद से जनता में भारी असंतोष देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि विज्ञापनों की चमचमाती दुनिया से बाहर निकलकर सरकार को जमीनी हकीकत देखनी चाहिए, जहां देश का आम नागरिक इस कमरतोड़ महंगाई और ‘टैक्स टेररिज्म’ से बुरी तरह त्रस्त हो चुका है। आलोचकों के अनुसार, यह केवल नीति का नहीं बल्कि नीयत का खोट है, जहां जनता की जेब खाली करके कंपनियों को मजबूत किया जा रहा है।
फिलहाल, इस मुद्दे पर सरकार या पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है कि घरेलू बाजार में तेल की कीमतें कब कम की जाएंगी
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,सीनियर एडिटर
(Allrights Magazine)

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