कर्नाटक मतदाता सूची पुनरीक्षण में बड़ी प्रशासनिक चूक: खुद को ‘मृत’ बताकर फॉर्म भरने वाले दर्जनों मामले आए सामने, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठे सवाल
“कर्नाटक मतदाता सूची में SIR प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल: खुद को ‘मृत’ बताने वाले आवेदन और फॉर्म-7 की गड़बड़ियों पर सियासी घमासान”
विशेष रिपोर्ट: चुनावी प्रक्रिया, प्रशासनिक पारदर्शिता एवं राजनीति (ऑल RIGHTs मैगजीन)
बेंगलुरु / नई दिल्ली: कर्नाटक में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की प्रक्रिया के दौरान सामने आए कुछ चौंकाने वाले आंकड़ों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और डिजिटल प्रबंधन व्यवस्था पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। हालिया आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि राज्य में ऐसे अनोखे मामले सामने आए हैं जहाँ जीवित मतदाताओं ने फॉर्म-7 के जरिए खुद को मृत बताकर अपना नाम सूची से हटाने के लिए आवेदन कर दिया है।
1. फॉर्म-7 के आंकड़ों में सामने आईं हैरान करने वाली विसंगतियां
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खुद को बताया मृत: रिपोर्टों के मुताबिक, SIR प्रक्रिया के दौरान कम से कम 37 ऐसे मतदाता सामने आए हैं जिन्होंने फॉर्म-7 (जो कि मुख्य रूप से मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने के लिए होता है) के तहत खुद को मृत घोषित कर अपने ही नाम विलोपन की अर्जी दे दी।
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परस्पर ‘मृत’ घोषित करने वाले जोड़े (334 Pairs): स्थिति तब और पेचीदा हो गई जब 334 ऐसे जोड़े सामने आए जिनमें एक व्यक्ति ने दूसरे को मृत बताया और ठीक उसी प्रक्रिया में दूसरे ने पहले वाले को मृत घोषित कर फॉर्म भर दिया। इनमें से कई मामले ऐसे हैं जहाँ दोनों मतदाताओं के मतदान केंद्र एक ही थे।
2. तकनीकी खामी या सोची-समझी साजिश?
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प्रशासनिक और साॅफ्टवेयर की भूमिका पर सवाल: इन त्रुटियों के सामने आने के बाद बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) और जिला निर्वाचन अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। कई मामलों में स्थानीय अधिकारियों ने इसे सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी, डेटा प्रविष्टि में तकनीकी चूक या प्रगणक प्रक्रिया की खामी करार दिया है।
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दुरुपयोग की आशंका: राजनीतिक दलों और विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस तरह की त्रुटियां या सुनियोजित तरीके से फॉर्म-7 का दुरुपयोग रोका नहीं गया, तो यह वैध और वास्तविक मतदाताओं के मताधिकार पर बड़ा आघात बन सकता है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत झूठी घोषणा करने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसे मामलों में सख्त और त्वरित कार्रवाई का अभाव चिंता का विषय बना हुआ है।
3. राजनीतिक सरगर्मी और ‘वोट चोरी’ के आरोप
इस पूरे घटनाक्रम के बाद विपक्षी दलों और राजनीतिक मंचों से इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। विपक्ष का आरोप है कि निर्वाचन प्रक्रिया की प्रणाली में इस प्रकार की कमियों का फायदा उठाकर सुनियोजित तरीके से मतदाताओं के अधिकार छीने जा रहे हैं, जबकि प्रशासनिक मशीनरी इन विसंगतियों पर पर्दा डालने का प्रयास कर रही है। निष्पक्ष लोकतंत्र के लिए मतदाता सूची की पवित्रता सर्वोपरि है, ऐसे में चुनाव आयोग के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले सभी तकनीकी और मानवीय त्रुटियों को पूरी पारदर्शिता के साथ दुरुस्त करे।
‘ऑल RIGHTs मैगजीन’ चुनावी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ी हर खबर पर पैनी नजर बनाए रखती है।
