संतान की लंबी आयु का कठिन व्रत जितिया: जानें 3 दिन के नियम, पूजा व कथा
“संतान की लंबी आयु और सुरक्षा का महापर्व जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत: जानें तीन दिवसीय नियम, पूजा विधि और पौराणिक कथा”
पटना / वाराणसी: हिंदू सनातन परंपरा में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व है। इस पावन तिथि को जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे लोकभाषा में जितिया या जिउतिया भी कहा जाता है, पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्रों में रखा जाने वाला यह व्रत सनातन धर्म के सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है।
माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, निरोगी काया, उज्ज्वल भविष्य और समस्त संकटों से रक्षा के लिए 24 घंटे से अधिक समय का कठिन निर्जला व्रत (बिना अन्न-जल का उपवास) रखती हैं।
तीन दिनों का कठिन नियम: नहाय-खाय से पारण तक
जितिया व्रत तीन दिनों तक चलने वाला एक महापर्व है, जिसके नियम अत्यंत कठोर और अनुशासित होते हैं:
-
पहला दिन (नहाय-खाय): सप्तमी तिथि के दिन माताएं पवित्र नदी या पोखरे में स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इस दिन विशेष रूप से ‘झिंगुनी’ (तोरई) की सब्जी, नोनी का साग और मडुआ (रागी) की रोटी खाने की परंपरा है।
-
दूसरा दिन (निर्जला उपवास व मुख्य पूजा): अष्टमी तिथि को माताएं पूरे दिन और रात बिना जल की एक बूंद ग्रहण किए निर्जला उपवास रखती हैं। संध्या समय या प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन, चील (चील्हो) और सियार (सिआरो) की मिट्टी/गोबर की प्रतिमाएं बनाकर विधि-विधान से धूप, दीप, अक्षत, फल और ‘जितिया धागा’ अर्पित कर पूजा व कथा का पाठ किया जाता है।
-
तीसरा दिन (पारण): नवमी तिथि को सूर्योदय के बाद अर्घ्य देने और जितिया की कथा का स्मरण करने के पश्चात ही माताएं पारण (व्रत खोलना) करती हैं। पारण में नोनी का साग और मडुआ का भोजन मुख्य रूप से लिया जाता है।
पौराणिक महत्व और कथाएं
जितिया व्रत से मुख्यतः दो पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं:
-
राजा जीमूतवाहन की कथा: गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन अत्यंत दयालु और त्यागी थे। उन्होंने एक नागमणि और वृद्ध नाग माता के पुत्र (शंखचूड़) की रक्षा के लिए स्वयं को पक्षीराज गरुड़ का आहार बनने के लिए समर्पित कर दिया था। जीमूतवाहन के इस अपार साहस और त्याग से प्रसन्न होकर गरुड़ देव ने उन्हें सभी मरे हुए नागों को जीवित करने का वरदान दिया। तभी से जीमूतवाहन को संतान रक्षक देवता के रूप में पूजा जाने लगा।
-
अश्वत्थामा और ब्रह्मास्त्र की कथा: महाभारत युद्ध के अंत में अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को समाप्त करने के लिए उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु (परीक्षित) पर ब्रह्मास्त्र चला दिया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पुण्यों का प्रभाव देकर उत्तरा के मृत शिशु को पुनः जीवित कर दिया। उसी समय से संतान की सुरक्षा के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत का विधान प्रचलित हुआ।
मां की ममता और अटूट तपस्या का प्रतीक
यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मां के निस्वार्थ प्रेम, त्याग और तपस्या का जीवंत उदाहरण है। मान्यता है कि जो माताएं विधिपूर्वक इस व्रत को पूर्ण करती हैं, उनकी संतान पर आने वाली बड़ी से बड़ी विपत्ति टल जाती है।
‘ऑल राइट्स मैगजीन’ जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत रखने वाली सभी माताओं को कोटि-कोटि नमन करती है और उनकी संतान की दीर्घायु व मंगलमय जीवन की कामना करती है।
एक दिन का मौन व्रत चमका सकता है किस्मत, मजबूत होता है बुध ग्रह
