हरिद्वार: सड़क धंसने से फंसी बच्चों की बस
सड़क धंसी या भ्रष्टाचार की व्यवस्था? हरिद्वार में बच्चों से भरी बस धंसी सड़क में फंसी; बाल-बाल बचे मासूम
विशेष रिपोर्ट:दीपक
हरिद्वार: धर्मनगरी हरिद्वार में निर्माण कार्यों और बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। हरिद्वार में स्कूली बच्चों से भरी एक बस का पहिया अचानक सड़क धंसने के कारण गहरे गड्ढे में समा गया। गनीमत यह रही कि बस चालक ने सूझबूझ और तत्परता दिखाते हुए समय रहते गाड़ी रोक दी, जिससे एक बड़ा और भयावह हादसा होने से टल गया। बस में सवार सभी स्कूली बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है।
लेकिन इस घटना ने एक बार फिर स्थानीय प्रशासन, लोक निर्माण विभाग (PWD) और भ्रष्टाचार के उस पूरे तंत्र पर करारा तमाचा जड़ा है, जो कागजों में तो गुणवत्ता के लंबे-चौड़े दावे करता है, लेकिन पहली ही बारिश या हल्के दबाव में ज़मीन में धंस जाता है।
एन वक्त पर बची मासूमों की जान: क्या था पूरा वाकया?
रोजमर्रा की तरह स्कूली बच्चों को लेकर जा रही बस जैसे ही क्षेत्र की मुख्य सड़क से गुजरी, अचानक सड़क की ऊपरी परत ताश के पत्तों की तरह ढह गई:
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सूझबूझ से टला हादसा: सड़क धंसते ही बस एक तरफ खतरनाक रूप से झुक गई। चालक ने तुरंत आपातकालीन ब्रेक लगाए और स्थानीय लोगों की मदद से सभी डरे-सहमे बच्चों को एक-एक करके खिड़की व दरवाजों से सुरक्षित बाहर निकाला।
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ठेकेदारों की खुली पोल: जिस सड़क पर यह हादसा हुआ, उसकी मरम्मत और निर्माण का काम हाल ही में कराए जाने की बात सामने आ रही है। मानकों को ताक पर रखकर की गई लीपापोती और बेस मटीरियल में घटिया सामग्री के इस्तेमाल के कारण यह सड़क धंसी।
‘ऑल राइट्स मैगजीन’ का सीधा सवाल: कब तक मासूमों की जान से खेलेगा भ्रष्टाचार?
चाहे दिल्ली-एनसीआर की अवैध इमारतें और जर्जर सड़कें हों या फिर हरिद्वार जैसे धार्मिक स्थलों में घटिया निर्माण—हर जगह एक ही पैटर्न दिखाई दे रहा है:
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कमीशनखोरी का खेल: टेंडर जारी होने से लेकर सड़क बनने तक इंजीनियरों, अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच चलने वाले कमीशनखोरी के खेल की कीमत आम जनता और अब मासूम स्कूली बच्चों को चुकानी पड़ रही है।
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केवल पैचवर्क और लीपापोती: सड़क की बुनियाद मजबूत करने के बजाय केवल ऊपर से डामर (लुक) की पतली परत चढ़ाकर बिल पास करा लिए जाते हैं।
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जांच के नाम पर खानापूर्ति: हर हादसे के बाद जांच समिति बिठा दी जाती है, लेकिन असल गुनहगार ठेकेदारों और भ्रष्ट अफसरों पर ब्लैकलिस्टिंग या एफआईआर जैसी सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती।
उत्तराखंड शासन और जिला प्रशासन को इस पूरे मामले में तत्काल संज्ञान लेते हुए संबंधित ठेकेदार और निगरानी करने वाले PWD इंजीनियरों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि फिर किसी बच्चे की जान जोखिम में न पड़े।
