डॉ. मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती: साहस, विद्वता और अखंड भारत के संकल्प का प्रेरणापुंज
नई दिल्ली: आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद, निस्वार्थ सेवा और उच्च नैतिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए अत्यंत विशेष और गौरवमयी है। देश आज आधुनिक भारत के महान निर्माता, प्रखर शिक्षाविद् और प्रखर राष्ट्रवादी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहा है। उनका संपूर्ण जीवन अदम्य साहस, मां भारती के प्रति अटूट समर्पण और जनसेवा का एक ऐसा प्रेरणादायक उदाहरण है, जो आज भी हर भारतीय के दिल में राष्ट्रप्रेम की अलख जगाता है।
सुविधाओं का त्याग कर चुना राष्ट्रसेवा का कठिन मार्ग
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म एक बेहद प्रतिष्ठित और समृद्ध परिवार में हुआ था, जहां उन्हें जीवन की तमाम सुख-सुविधाएं आसानी से उपलब्ध थीं। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी अपने समय के महान और सम्मानित शिक्षाविदों में गिने जाते थे। लेकिन, तमाम ऐशो-आराम के बावजूद डॉ. मुखर्जी ने त्याग, तपस्या और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करना हो, सांप्रदायिकता से लड़ना हो या मानवीय संकटों का सामना करना—वे देश की चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर चुप नहीं बैठ सकते।
इस सफर में उन्हें गहरे व्यक्तिगत आघात भी सहने पड़े; उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और असमय ही उनकी पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन हृदयविदारक परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को टूटने नहीं दिया, बल्कि उनका संकल्प मां भारती के लिए और अधिक सशक्त व गहरा होता चला गया।
भारत की अखंडता के लिए सर्वोच्च बलिदान
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा और पवित्र उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था:
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पश्चिम बंगाल का विलायन: देश के विभाजन के अत्यंत कठिन समय में उन्होंने अपनी सूझबूझ और कड़े संघर्ष से पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
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जम्मू-कश्मीर आंदोलन: ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ का नारा देकर उन्होंने जम्मू-कश्मीर के पूर्ण विलय के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किया।
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सर्वोच्च बलिदान: जेल और नजरबंदी भी उनके संकल्पों को डिगा नहीं सकी। नजरबंदी के दौरान ही उनका रहस्यमयी परिस्थितियों में निधन हुआ, जो राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र की स्मृति का अमूल्य हिस्सा बन गया। आचार्य विनोबा भावे ने उनके इस बलिदान पर कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया, जिस पर उन्हें अटूट विश्वास था। वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 और 35(A) का हटाया जाना उनके इसी सपने और बलिदान के प्रति देश की सच्ची श्रद्धांजलि थी।
शिक्षा जगत में क्रांतिकारी बदलाव: कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति
डॉ. मुखर्जी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी शिक्षाविद् भी थे। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के इतिहास में सबसे युवा कुलपति (Vice-Chancellor) बने। उन्होंने तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेजों के ढर्रे से निकालकर राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप ढाला। एक सम्मेलन में उन्होंने स्पष्ट कहा था:
“शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना सबसे बड़ी भूल है। हमें विद्यार्थियों को ऐसा तैयार करना होगा ताकि वे देश के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय व केंद्रीय विधायिकाओं में नेतृत्व की भूमिका निभा सकें और वित्त, व्यापार व उद्योग जैसे क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा दिखा सकें।”
विश्वविद्यालय में किए गए मुख्य सुधार:
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रिसर्च और आधुनिक पाठ्यक्रम: विज्ञान में रिसर्च को बढ़ावा दिया, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित किया और कृषि से जुड़े विशेष पाठ्यक्रम शुरू किए।
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छात्र कल्याण और पुस्तकालय: लाइब्रेरी की सुविधाओं में व्यापक सुधार किया तथा खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर पर विशेष ध्यान दिया।
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गौरव की भावना: विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना जगाने के लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की गौरवमयी परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक विशेष गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्रहित से ऊपर कुछ भी नहीं है। उनकी 125वीं जन्म-जयंती पर देश उन्हें शत-शत नमन करता है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती: साहस, विद्वता और अखंड भारत के संकल्प का प्रेरणापुंज
नई दिल्ली: आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद, निस्वार्थ सेवा और उच्च नैतिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए अत्यंत विशेष और गौरवमयी है। देश आज आधुनिक भारत के महान निर्माता, प्रखर शिक्षाविद् और प्रखर राष्ट्रवादी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहा है। उनका संपूर्ण जीवन अदम्य साहस, मां भारती के प्रति अटूट समर्पण और जनसेवा का एक ऐसा प्रेरणादायक उदाहरण है, जो आज भी हर भारतीय के दिल में राष्ट्रप्रेम की अलख जगाता है।
सुविधाओं का त्याग कर चुना राष्ट्रसेवा का कठिन मार्ग
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म एक बेहद प्रतिष्ठित और समृद्ध परिवार में हुआ था, जहां उन्हें जीवन की तमाम सुख-सुविधाएं आसानी से उपलब्ध थीं। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी अपने समय के महान और सम्मानित शिक्षाविदों में गिने जाते थे। लेकिन, तमाम ऐशो-आराम के बावजूद डॉ. मुखर्जी ने त्याग, तपस्या और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करना हो, सांप्रदायिकता से लड़ना हो या मानवीय संकटों का सामना करना—वे देश की चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर चुप नहीं बैठ सकते।
इस सफर में उन्हें गहरे व्यक्तिगत आघात भी सहने पड़े; उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और असमय ही उनकी पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन हृदयविदारक परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को टूटने नहीं दिया, बल्कि उनका संकल्प मां भारती के लिए और अधिक सशक्त व गहरा होता चला गया।
भारत की अखंडता के लिए सर्वोच्च बलिदान
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा और पवित्र उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था:
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पश्चिम बंगाल का विलायन: देश के विभाजन के अत्यंत कठिन समय में उन्होंने अपनी सूझबूझ और कड़े संघर्ष से पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
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जम्मू-कश्मीर आंदोलन: ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ का नारा देकर उन्होंने जम्मू-कश्मीर के पूर्ण विलय के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किया।
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सर्वोच्च बलिदान: जेल और नजरबंदी भी उनके संकल्पों को डिगा नहीं सकी। नजरबंदी के दौरान ही उनका रहस्यमयी परिस्थितियों में निधन हुआ, जो राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र की स्मृति का अमूल्य हिस्सा बन गया। आचार्य विनोबा भावे ने उनके इस बलिदान पर कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया, जिस पर उन्हें अटूट विश्वास था। वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 और 35(A) का हटाया जाना उनके इसी सपने और बलिदान के प्रति देश की सच्ची श्रद्धांजलि थी।
शिक्षा जगत में क्रांतिकारी बदलाव: कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति
डॉ. मुखर्जी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी शिक्षाविद् भी थे। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के इतिहास में सबसे युवा कुलपति (Vice-Chancellor) बने। उन्होंने तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेजों के ढर्रे से निकालकर राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप ढाला। एक सम्मेलन में उन्होंने स्पष्ट कहा था:
“शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना सबसे बड़ी भूल है। हमें विद्यार्थियों को ऐसा तैयार करना होगा ताकि वे देश के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय व केंद्रीय विधायिकाओं में नेतृत्व की भूमिका निभा सकें और वित्त, व्यापार व उद्योग जैसे क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा दिखा सकें।”
विश्वविद्यालय में किए गए मुख्य सुधार:
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रिसर्च और आधुनिक पाठ्यक्रम: विज्ञान में रिसर्च को बढ़ावा दिया, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित किया और कृषि से जुड़े विशेष पाठ्यक्रम शुरू किए।
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छात्र कल्याण और पुस्तकालय: लाइब्रेरी की सुविधाओं में व्यापक सुधार किया तथा खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर पर विशेष ध्यान दिया।
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गौरव की भावना: विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना जगाने के लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की गौरवमयी परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक विशेष गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्रहित से ऊपर कुछ भी नहीं है। उनकी 125वीं जन्म-जयंती पर देश उन्हें शत-शत नमन करता है।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,संपादक)
(एडिटर (Allrights Magazine)

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