स्टेनलेस स्टील के लिए राष्ट्रीय नीति की मांग

जंग से बचेंगे पुल, रेलवे और इंफ्रास्ट्रक्चर! स्टेनलेस स्टील उद्योग ने रखा बड़ा रोडमैप

मुंबई: देश में जंग (करॉजन) के कारण हर साल होने वाले करीब ₹12 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम आर्थिक नुकसान को रोकने के लिए भारतीय स्टेनलेस स्टील उद्योग ने केंद्र सरकार के समक्ष एक बड़ा रोडमैप प्रस्तुत किया है। ‘इंडियन स्टेनलेस स्टील डेवलपमेंट एसोसिएशन’ (ISSDA) और ‘ग्लोबल स्टेनलेस स्टील एक्सपो’ (GSSE) के बीच हुई एक रणनीतिक साझेदारी के दौरान उद्योग जगत ने सरकार से एक समर्पित राष्ट्रीय स्टेनलेस स्टील नीति और राष्ट्रीय एंटी-करॉजन मिशन लागू करने की पुरजोर मांग की है।

करॉजन से जीडीपी को 4% का नुकसान, खपत बढ़ाने पर जोर

बैठक के दौरान आईएसएसडीए (ISSDA) के अध्यक्ष राजामणि कृष्णमूर्ति ने भारतीय बाजार की मौजूदा स्थिति और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला:

  • वैश्विक हब बनने की क्षमता: भारत के पास उन्नत स्टेनलेस स्टील उत्पादन का वैश्विक केंद्र बनने की पूरी क्षमता है, बशर्ते इसके लिए सरकार से एक अलग राष्ट्रीय नीति और ठोस नीतिगत समर्थन हासिल हो।

  • खपत में भारी अंतर: भारत में वर्तमान में प्रति व्यक्ति स्टेनलेस स्टील की खपत महज 3.5 किलोग्राम है, जबकि इसका वैश्विक औसत 6 से 7 किलोग्राम के बीच है। इसमें बढ़ोतरी की अपार संभावनाएं हैं।

  • आर्थिक बचत का गणित: जंग (Corrosion) के कारण देश को अपनी कुल जीडीपी का लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा गंवाना पड़ता है। यदि सही नीति के तहत बुनियादी ढांचे (रेलवे, पुल, हाईवे) में जंग-रोधी सामग्री का उपयोग अनिवार्य किया जाए, तो इस नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।

बढ़ते आयात और कच्चे माल की चुनौतियां

घरेलू विनिर्माण और सप्लाई चेन को मजबूत करने की वकालत करते हुए जिंदल स्टेनलेस लिमिटेड (Jindal Stainless Limited) के ग्रुप हेड राजीव गर्ग ने उद्योग की सामूहिक आवाज को बुलंद करने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा:

“विदेशी बाजारों से बढ़ते आयात और कच्चे माल की उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों के बीच घरेलू उद्योग को सशक्त करने का यह बिल्कुल सही समय है। स्टेनलेस स्टील एक टिकाऊ, रीसायकल होने योग्य (पर्यावरण-अनुकूल) और दीर्घकालिक लागत बचाने वाली सामग्री है, इसलिए इसे अन्य धातुओं से अलग एक स्वतंत्र नीतिगत पहचान मिलनी चाहिए।”

नई नीति से आत्मनिर्भरता को मिलेगी रफ्तार

उद्योग विशेषज्ञों का सामूहिक रूप से मानना है कि केंद्र सरकार द्वारा एक नई समर्पित नीति और ‘एंटी-करॉजन मिशन’ की शुरुआत करने से:

  • घरेलू विनिर्माण (डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग) को अभूतपूर्व बढ़ावा मिलेगा।

  • घटिया और सस्ते विदेशी आयात पर भारत की निर्भरता कम होगी।

देश के सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की उम्र दोगुनी होगी और रखरखाव का खर्च घटेगा, जिससे भारत तेजी से वैश्विक विनिर्माण महाशक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।


रिपोर्ट: कॉर्पोरेट और आर्थिक डेस्क, मुंबई

(गोपाल चन्द्र अग्रवाल,संपादक)

 (एडिटर (Allrights Magazine)


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