चीन ने बनाया 582 टन का ‘नकली सूरज”

चीन ने रचा इतिहास: 582 टन का ‘नकली सूरज’ बनाकर किया सफल टेस्ट; असीमित और साफ ऊर्जा की दिशा में बड़ी कामयाबी


रिपोर्ट: सोनू कुमार (पत्रकार)

विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में चीन ने एक बार फिर दुनिया को हैरान कर दिया है। चीन ने धरती पर ‘आर्टिफिशियल सन’ (नकली सूरज) बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी सफलता हासिल की है। चीन के वैज्ञानिकों ने न्यूक्लियर फ्यूजन (परमाणु संलयन) के जरिए साफ, सस्ती और असीमित ऊर्जा पैदा करने के लिए दुनिया के सबसे बड़े सुपरकंडक्टिंग फ्यूजन मैग्नेट (Superconducting Fusion Magnet) का निर्माण कर उसका सफल परीक्षण संपन्न कर लिया है।

साल 2030 तक फ्यूजन पावर से वाणिज्यिक बिजली पैदा करने की चीन की महत्वाकांक्षी योजना में इस उपलब्धि को एक मील का पत्थर माना जा रहा है। इसके साथ ही चीन दुनिया भर में कार्बन-मुक्त ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत हासिल करने की रेस में सबसे आगे निकल गया है।

कितना विशाल है यह ‘सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट’?

इस विशालकाय और शक्तिशाली सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट को चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के अंतर्गत आने वाले इन्स्टीट्यूट ऑफ प्लाज्मा फिजिक्स ने विकसित किया है:

  • आकार और बनावट: यह मैग्नेट अंग्रेजी के ‘D’ अक्षर के आकार का एक विशाल ढांचा है।

  • लंबाई व चौड़ाई: इसकी लंबाई 21 मीटर और चौड़ाई 12 मीटर है।

  • वजन: इस अद्वितीय वैज्ञानिक ढांचे का कुल वजन 582 टन है।

आखिर क्या है ‘नकली सूरज’ और कैसे करता है काम?

कृत्रिम सूर्य वास्तव में एक उच्च-स्तरीय न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर है, जो ठीक उसी वैज्ञानिक प्रक्रिया को दोहराता है जिससे असली सूर्य के केंद्र में अपार ऊर्जा उत्पन्न होती है:

  1. 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस तापमान: यह रिएक्टर 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस से भी अधिक के अत्यधिक उच्च तापमान पर हाइड्रोजन के परमाणुओं (Atoms) को आपस में जोड़ता (Fuse) है।

  2. शून्य कार्बन उत्सर्जन: इस पूरी प्रक्रिया में बिना किसी कार्बन डाइऑक्साइड या खतरनाक जहरीली गैसों के उत्सर्जन के विशाल पैमाने पर स्वच्छ ऊर्जा पैदा होती है।

  3. सेंट्रल सोलेनॉइड कॉइल (रिएक्टर का दिल): मैग्नेट के साथ-साथ चीनी शोधकर्ताओं ने हाई-टेम्परेचर सुपरकंडक्टिंग सेंट्रल सोलेनॉइड कॉइल का भी सफल परीक्षण किया है। इसे फ्यूजन रिएक्टर का ‘दिल’ और स्पार्क प्लग कहा जाता है, जो रिएक्शन के लिए जरूरी प्लाज्मा को शुरू करने और उसे नियंत्रित रखने का काम करता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह तकनीक पूरी तरह से सफल हो जाती है, तो आने वाले समय में दुनिया भर से ऊर्जा संकट और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है।


(गोपाल चन्द्र अग्रवाल,)

सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)

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