# यह हॉल जनता के काम क्यों नहीं आ रहा?

बरेली का ऐतिहासिक संजय गांधी कम्युनिटी हॉल: दुर्दशा, विवाद और उपेक्षा के मुख्य सवाल

बरेली का सबसे पुराना और ऐतिहासिक संजय गांधी कम्युनिटी हॉल पिछले लंबे समय से अपनी बदहाली और दुर्दशा को लेकर शहर के नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध वर्ग के बीच गहरी चिंता और आक्रोश का विषय बना हुआ है। कभी शहर की सांस्कृतिक, साहित्यिक और सामाजिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र रहा यह हॉल आज खुद अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। इस ऐतिहासिक धरोहर को लेकर जनता के बीच कई गंभीर सवाल तैर रहे हैं:

1. क्या यह एक सुनियोजित षड्यंत्र है?

हॉल की वर्तमान स्थिति को देखकर स्थानीय निवासियों और जानकारों का मानना है कि इसे जानबूझकर उपेक्षा का शिकार बनाया गया है।

  • रखरखाव का अभाव: सालों से इसके सुंदरीकरण, मरम्मत और सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया, जिससे इसकी इमारत जर्जर होती चली गई।

  • मूल रूप को बदलने की तैयारी की आशंका: शहर के सांस्कृतिक हलकों में यह आशंका लगातार जताई जा रही है कि इसकी दुर्दशा के पीछे इसे किसी व्यावसायिक परिसर (Commercial Complex) या अन्य किसी नए प्रोजेक्ट में तब्दील करने की मंशा हो सकती है, जिससे इस ऐतिहासिक धरोहर का मूल स्वरूप और इसकी पहचान हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।

2. इस दुर्दशा की जिम्मेदारी किसकी है?

संजय गांधी कम्युनिटी हॉल की इस दयनीय स्थिति के लिए सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासनिक निकाय और जनप्रतिनिधि कटघरे में हैं:

  • नगर निगम और प्रशासनिक उपेक्षा: इस सरकारी संपत्ति की देखरेख और संचालन की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन व नगर निगम की है। समय रहते बजट का सही आवंटन न होना और इसके पुनरुद्धार (Renovation) के लिए किसी ठोस कार्ययोजना का न बनना प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।

  • इच्छाशक्ति की कमी: शहर की अन्य नई इमारतों और पार्कों के सौंदर्यीकरण पर तो ध्यान दिया गया, लेकिन बरेली की इस ऐतिहासिक पहचान को पूरी तरह हाशिए पर डाल दिया गया।

3. जनता के काम क्यों नहीं आ रहा है यह हॉल?

बरेली का यह सबसे पुराना हॉल आज पूरी तरह बंद या अनुपयोगी पड़ा है, जिसके कारण आम जनता और स्थानीय कलाकारों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है:

  • बुनियादी सुविधाओं का ढहना: हॉल के भीतर की कुर्सियां, स्टेज, बिजली की वायरिंग, एसी और शौचालय पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं। असामाजिक तत्वों के जमावड़े और गंदगी के कारण यह स्थान अब किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम के योग्य नहीं रह गया है।

  • महंगे निजी लॉन पर निर्भरता: इस सरकारी और किफायती कम्युनिटी हॉल के बंद होने से मध्यमवर्गीय परिवारों और स्थानीय संस्थाओं को मजबूरन महंगे निजी मैरिज हॉलों और होटलों का रुख करना पड़ता है, जिससे उन पर आर्थिक बोझ बढ़ता है।

निष्कर्ष और मांग

बरेली की जनता और सामाजिक संगठनों की लगातार यह मांग रही है कि प्रशासन इस धरोहर को किसी भी निजी हाथों में सौंपने या इसका मूल स्वरूप बदलने के बजाए, ‘स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट’ या अन्य राजकीय कोष के माध्यम से इसका जीर्णोद्धार कराए। इसे दोबारा बरेली के सांस्कृतिक गौरव के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए ताकि यह न्यूनतम दरों पर आम जनता और सामाजिक कार्यों के लिए उपलब्ध हो सके।



बरेली: अमरजीत
(गोपाल चन्द्र अग्रवाल,संपादक)
 (एडिटर (Allrights Magazine)

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