आज रखा जा रहा है अहोई अष्टमी व्रत, नोट करें शुभ मुहूर्त,
नई दिल्ली। अहोई अष्टमी हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। महिलाएं यह व्रत संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। इस व्रत को हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर रखा जाता है।
कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत: 01 नवंबर को दोपहर 02 बजकर 51 मिनट पर
कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का समापन: 02 नवंबर को दोपहर 01 बजकर 10 मिनट पर
वैदिक पंचांग के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत 01 नवंबर को रखा जा रहा है।
अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त: शाम 05 बजकर 36 मिनट से 06 बजकर 54 मिनट तक
तारों को देखने का समय: शाम 06 बजे
अहोई अष्टमी के दिन चन्द्रोदय का समय: रात 11 बजकर 40 मिनट पर
अहोई अष्टमी पूजा विधि
अहोई अष्टमी के दिन दीवार पर गेरू से अहोई माता की तस्वीर बनाएं।
शाम को शुभ मुहूर्त में अहोई माता की पूजा-अर्चना करने का विधान है।
अहोई माता को रोली, अक्षत और फूल अर्पित करें।
देसी घी का दीपक जलाकर आरती करें।
व्रत कथा का पाठ करें।
पूजा में माता को हलवा, पुए, पूरी या मीठे गुलगुले का भोग लगाया जाता है।
संतान के जीवन में सुख-शांति और तरक्की के लिए अहोई माता से प्रार्थना करें।
तारे निकलने पर कलश के जल से अर्घ्य दें।
तारों के दर्शन और अर्घ्य के बाद ही पानी पीकर और प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण किया जाता है।
अहोई अष्टमी कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे, सात बहुएं और एक बेटी थी। एक बार दिवाली से पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए सातों बहुएं अपनी ननद के साथ जंगल से मिट्टी लेने गईं। मिट्टी खोदते समय अनजाने में साहूकार की बेटी की कुदाल से स्याहू (सेही) के सात बच्चों की मृत्यु हो गई। इस पर क्रोधित होकर स्याहू ने उसे श्राप दिया, “मैं तुम्हारी कोख बांध दूंगी।” यह सुनकर साहूकार की बेटी घबरा गई और अपनी भाभियों से विनती की कि कोई उसके बदले इस श्राप को अपने ऊपर ले ले। सभी ने मना कर दिया, लेकिन सबसे छोटी भाभी अपनी ननद की खातिर अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो गई।
इस श्राप के कारण साहूकार की सबसे छोटी बहू की जब भी कोई संतान होती, तो वह ठीक सातवें दिन मर जाती। जब उसके सात पुत्रों की इसी तरह मृत्यु हो गई, तो दुखी साहूकार ने एक पंडित से इसका कारण और उपाय पूछा। पंडित ने छोटी बहू को सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी। छोटी बहू की निस्वार्थ सेवा से सुरही गाय अत्यंत प्रसन्न हुई और उसे स्याहू के पास ले जाने के लिए तैयार हो गई।
रास्ते में जब दोनों थककर आराम कर रहे थे, तभी छोटी बहू ने देखा कि एक सांप गरुड़ के बच्चे को डसने जा रहा है। उसने तुरंत उस सांप को मार दिया और बच्चे की जान बचा ली। थोड़ी देर बाद जब गरुड़ वहां लौटा, तो खून देखकर उसे लगा कि छोटी बहू ने ही उसके बच्चे को मारा है। वह क्रोध में छोटी बहू पर वार करने लगा। तब छोटी बहू ने पूरी बात बताई कि उसने तो बच्चे की जान बचाई है। सच्चाई जानकर गरुड़ बहुत खुश हुआ और उसने मदद करते हुए सुरही गाय के साथ छोटी बहू को अपनी पीठ पर बैठाकर स्याहू के पास पहुंचा दिया।
वहां पहुंचकर छोटी बहू ने स्याहू की खूब सेवा की। उसकी सेवा और समर्पण से प्रसन्न होकर स्याहू ने उसे सात पुत्र और सात बहुओं का आशीर्वाद दिया। स्याहू के इस आशीर्वाद से छोटी बहू का घर एक बार फिर खुशियों, पुत्रों और पुत्रवधुओं से हरा-भरा हो गया।
अहोई माता की आरती
जय अहोई माता, जय अहोई माता!
तुमको निसदिन ध्यावत हर विष्णु विधाता। टेक।।
ब्राहमणी, रुद्राणी, कमला तू ही है जगमाता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत नारद ऋषि गाता।। जय।।
माता रूप निरंजन सुख-सम्पत्ति दाता।।
जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता।। जय।।
तू ही पाताल बसंती, तू ही है शुभदाता।
कर्म-प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता।। जय।।
जिस घर थारो वासा वाहि में गुण आता।।
कर न सके सोई कर ले मन नहीं धड़काता।। जय।।
तुम बिन सुख न होवे न कोई पुत्र पाता।
खान-पान का वैभव तुम बिन नहीं आता।। जय।।
शुभ गुण सुंदर युक्ता क्षीर निधि जाता।
रतन चतुर्दश तोकू कोई नहीं पाता।। जय।।
श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता।
उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता।।
