स्ट्रोक: बीमा कवर की बढ़ती मांग

स्ट्रोक के बाद की जंग: इलाज है, पर बीमा कवरेज की दरकार

भारत में स्ट्रोक अब केवल एक तात्कालिक मेडिकल इमरजेंसी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक लंबी और चुनौतीपूर्ण बीमारी के रूप में उभर रहा है। हालांकि चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के कारण समय पर इलाज से मरीजों की जान बचाना आसान हुआ है, लेकिन अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद का संघर्ष कहीं अधिक कठिन और महंगा है।


न्यूरो-रिहैबिलिटेशन: जीवन के लिए अनिवार्य, लेकिन बीमा से बाहर

स्ट्रोक से उबरने के बाद मरीज को पूरी तरह सामान्य जीवन में लौटाने के लिए न्यूरो-रिहैबिलिटेशन (Neuro-rehabilitation) सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। इसमें फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और विशेषज्ञों की निरंतर निगरानी शामिल होती है।

  • आर्थिक बोझ: विडंबना यह है कि यह अनिवार्य इलाज अभी भी अधिकांश बीमा पॉलिसियों (Insurance Policies) के दायरे से बाहर है। इसके कारण लाखों परिवारों को इलाज के लिए भारी आर्थिक और मानसिक दबाव झेलना पड़ता है।

  • विशेषज्ञों की राय: कोकिलाबेन अस्पताल, मुंबई के न्यूरो-रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव के अनुसार, रिकवरी एक लंबी प्रक्रिया है। जब यह खर्च बीमा में शामिल नहीं होता, तो परिवारों पर वित्तीय संकट खड़ा हो जाता है।

भारत में स्ट्रोक की स्थिति: आंकड़े डराने वाले

इंडियन फेडरेशन ऑफ न्यूरोरेहैबिलिटेशन के अध्यक्ष डॉ. निर्मल सुर्या ने देश की गंभीर स्थिति पर प्रकाश डाला है:

  • सालाना मामले: भारत में हर साल 12.5 लाख से अधिक नए स्ट्रोक के मामले दर्ज किए जाते हैं।

  • अधूरी जिंदगी: हालांकि मृत्यु दर में कमी आई है, लेकिन प्रभावी रिहैबिलिटेशन की अनुपलब्धता और महंगाई के कारण मरीजों की जिंदगी ‘अधूरी’ रह जाती है।

नई तकनीक और भविष्य की राह

एआई (AI) आधारित इलाज, रोबोटिक्स और टेली-न्यूरोरेहैबिलिटेशन जैसी आधुनिक तकनीकें उम्मीद की नई किरण दिखा रही हैं, लेकिन इनकी पहुंच अभी भी सीमित है।

  • बीमा में शामिल करने की मांग: विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ‘पोस्ट-स्ट्रोक केयर’ को बीमा कवरेज में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए, तो मरीज न केवल जीवित रहेंगे, बल्कि आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जीने में सक्षम होंगे।

स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती मरीज की जान बचाने के साथ-साथ उसे कार्यक्षम बनाने की है, जिसके लिए सुलभ और किफायती रिहैबिलिटेशन सुविधाएं समय की मांग हैं।


(मुंबई: अनिल बेदाग)

गोपाल चन्द्र अग्रवाल,

सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)


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