श्रीप्रकाश जायसवाल: 1999 की जीत, 15 साल सांसद

🗳️ 1999 लोकसभा चुनाव: जब श्रीप्रकाश जायसवाल ने ‘अंतिम तीन दिन’ में पलट दी बाजी, कानपुर में बनाया 15 साल सांसद रहने का रिकॉर्ड!

 

कानपुर (उत्तर प्रदेश): भारतीय राजनीति में कुछ जीत ऐसी होती हैं जो सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प की कहानी कहती हैं। कांग्रेस के कद्दावर नेता श्रीप्रकाश जायसवाल की 1999 लोकसभा चुनाव की जीत ऐसी ही एक गाथा है। हताशा और निराशा के माहौल के बावजूद, उन्होंने अंतिम समय में किए गए अथक प्रयास से न केवल चुनाव जीता, बल्कि कानपुर संसदीय सीट पर एक बड़ा राजनीतिक रिकॉर्ड भी बनाया।

📉 हताशा से संघर्ष तक: 2.45 लाख वोटों की खाई

 

1999 के चुनाव में श्रीप्रकाश जायसवाल की उम्मीदें लगभग खत्म हो चुकी थीं। इसके पीछे मजबूत कारण था:

  • मजबूत प्रतिद्वंद्वी: उनके सामने भाजपा के जगतवीर सिंह द्रोण थे, जो 1991, 1996 और 1998 में लगातार तीन बार जीत चुके थे।

  • पिछला प्रदर्शन: 1998 के पिछले चुनाव में जायसवाल तीसरे नंबर पर रहे थे और द्रोण से 2,45,722 वोटों के भारी अंतर से पीछे थे।

मतदान से केवल तीन दिन पहले, जब हताशा चरम पर थी, उनके करीबियों ने उन्हें अंतिम प्रयास करने की सलाह दी। इस प्रेरणा से जायसवाल ने टीम को फिर से संगठित किया और अंतिम तीन दिन कांग्रेसी कार्यकर्ता पूरी ताकत से सड़कों और बूथों पर जुट गए।

🏆 15 साल का रिकॉर्ड: कानपुर के सबसे लंबे कार्यकाल वाले सांसद

 

इस अंतिम संघर्ष का परिणाम ऐतिहासिक रहा। श्रीप्रकाश जायसवाल ने जगतवीर सिंह द्रोण को हराकर न केवल 1999 का चुनाव जीता, बल्कि कानपुर सांसद के रूप में लगातार 15 वर्ष तक सीट पर काबिज रहने का रिकॉर्ड भी बनाया।

चुनाव वर्ष प्रतिद्वंद्वी परिणाम वोटों का अंतर
1999 जगतवीर सिंह द्रोण (BJP) जीत (जीत दर्ज की)
2004 सत्यदेव पचौरी (BJP) जीत 5,638 वोट
2009 सतीश महाना (BJP) जीत 18,906 वोट

राजनीतिक दल के सांसदों में 15 वर्ष का यह कार्यकाल कानपुर संसदीय सीट पर सबसे लंबा है।

🌅 राजनीतिक सफर का अंत: 2014 और 2019 की हार

 

2014 में, जब भाजपा केंद्र में सत्ता में आने की तैयारी कर रही थी, जायसवाल के सामने भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी को उतारा गया। इस चुनाव में उन्हें 2,22,946 वोटों से बड़ी हार मिली।

2019 का चुनाव उनका अंतिम संघर्ष बना। हालांकि उन्हें अपने जीवन के सबसे अधिक 3,13,003 वोट मिले, लेकिन सत्यदेव पचौरी ने उन्हें 1,55,934 वोटों के अंतर से पराजित कर दिया। इसके बाद से, श्रीप्रकाश जायसवाल ने धीरे-धीरे राजनीतिक सक्रियता से दूरी बना ली।


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