शाहाना के गोल्डन जुबली फिनाले में दिखा भारतीय संस्कृति का भव्य रंग, टैगोर की विरासत और नारी शक्ति ने जीता दिल
‘राजेंद्रनंदिनी – द वॉरियर प्रिंसेस’ से लेकर ‘आलोकधारा’ तक, दादर के वीर सावरकर ऑडिटोरियम में सजी कला और संस्कृति की यादगार शाम
मुंबई: भारतीय कला, संगीत, नृत्य और साहित्य की समृद्ध परंपरा को समर्पित एक विशेष शाम में शाहाना (टैगोर सेंटर फॉर इंडियन म्यूजिक एंड कल्चर) ने अपने 51वें स्थापना वर्ष के गोल्डन जुबली समारोह का भव्य समापन किया। दादर स्थित वीर सावरकर ऑडिटोरियम में आयोजित इस कार्यक्रम में दर्शकों को शास्त्रीय नृत्य, रंगमंच, रवींद्र संगीत और कविता का खूबसूरत संगम देखने को मिला।
इस सांस्कृतिक संध्या की सबसे खास प्रस्तुति ‘राजेंद्रनंदिनी – द वॉरियर प्रिंसेस’ रही। यह नाटक रवींद्रनाथ टैगोर की चर्चित रचना ‘चित्रांगदा’ से प्रेरित एक नए मंचीय रूपांतरण के तौर पर प्रस्तुत किया गया। शाहाना की मानद क्रिएटिव हेड अनुश्री बनर्जी ने इसका निर्देशन और कोरियोग्राफी की।

प्रस्तुति के जरिए एक ऐसी महिला किरदार की कहानी सामने रखी गई, जो अपनी पहचान और आत्मसम्मान को बाहरी सुंदरता से ऊपर रखती है। इसमें लैंगिक समानता, आत्मविश्वास और व्यक्ति की आंतरिक शक्ति जैसे विचारों को प्रमुखता दी गई। अनुश्री बनर्जी ने भी टैगोर की रचनाओं की व्यापक प्रासंगिकता पर जोर देते हुए उन्हें किसी एक क्षेत्र या समुदाय तक सीमित न मानने की बात कही।
चित्रांगदा के किरदार में दिखी नृत्य और अभिनय की खूबसूरत जुगलबंदी
मणिपुरी नृत्य की कलाकार पुर्बिता मुखर्जी ने चित्रांगदा की भूमिका को भावपूर्ण अंदाज़ में प्रस्तुत किया। उनके नृत्य और अभिनय में किरदार की दृढ़ता, संवेदनशीलता और आत्मसम्मान को उभारने की कोशिश दिखाई दी।

वहीं भरतनाट्यम और रवींद्रिक नृत्य शैली से जुड़े कलाकार अनिलकुमार सिंह ने अर्जुन की भूमिका निभाई। उनकी प्रस्तुति ने नाटक के भावनात्मक पक्ष को मजबूती दी और कहानी में मौजूद आंतरिक संघर्ष को मंच पर प्रभावी रूप से सामने रखा।
अनिलकुमार सिंह के अनुसार, प्रस्तुति का एक महत्वपूर्ण विचार यह था कि वास्तविक जीत केवल बाहरी संघर्ष में नहीं, बल्कि व्यक्ति के अपने भीतर के बदलाव में भी छिपी होती है।
‘आलोकधारा’ ने दी भावुक सांस्कृतिक शाम को संगीत की रोशनी
कार्यक्रम का दूसरा प्रमुख आकर्षण ‘आलोकधारा’ रहा। यह प्रस्तुति शाहाना के संस्थापकों इंद्राणी आचार्य, सुनंदा मजूमदार और स्निग्धा बसु को समर्पित थी।
रवींद्र संगीत पर आधारित इस विशेष प्रस्तुति में श्रमणा चट्टोपाध्याय, मेघ और पलाशी घोष ने अपनी आवाज से शाम को संगीतमय बनाया। उनके गायन ने कार्यक्रम के भावनात्मक माहौल को और गहराई दी।
इस दौरान उपमन्यु भट्टाचार्य की कविता और अरूप चौधरी का संगीत निर्देशन भी कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। संगीत और कविता के इस मेल ने शाहाना की सांस्कृतिक यात्रा और उसके संस्थापकों के योगदान को श्रद्धांजलि देने का काम किया।
टैगोर की सोच और भारतीय परंपरा का आधुनिक मंचीय रूप
शाहाना के गोल्डन जुबली फिनाले की खासियत यह रही कि कार्यक्रम ने भारतीय शास्त्रीय कलाओं को सिर्फ प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उनके पीछे मौजूद विचारों को भी दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की।
टैगोर की रचनाओं में दिखाई देने वाली मानवीय गरिमा, समानता और आत्मसम्मान की सोच को नृत्य, संगीत और रंगमंच के माध्यम से नए अंदाज़ में सामने रखा गया। वहीं महिला सशक्तिकरण और अपनी पहचान को स्वीकार करने का संदेश पूरे कार्यक्रम में प्रमुखता से उभरा।
इस तरह शाहाना का यह गोल्डन जुबली समापन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम भर नहीं रहा, बल्कि भारतीय कला परंपरा, टैगोर की विचारधारा और मानवीय मूल्यों को समर्पित एक यादगार आयोजन के रूप में सामने आया।
रिपोर्ट: अनिल बेदाग,
मुंबई,
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