बरेली में बीजेपी नेता पर गंभीर आरोप

बरेली में जमीनी विवाद: भाजपा नेता पर जबरन कब्जे का आरोप, एक महीने बाद दर्ज हुई FIR पर उठे गंभीर सवाल

बरेली: उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से भू-माफियागिरी, राजनीतिक रसूख और पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाने वाला एक बड़ा मामला प्रकाश में आया है। बदायूं निवासी अशोक कपूर और उनके सहयोगियों ने बरेली में एक प्रेस वार्ता आयोजित कर सत्ताधारी दल के एक स्थानीय नेता पर न्यायालय में विचाराधीन जमीन पर अवैध रूप से कब्जा करने और पुलिस की मिलीभगत से झूठी एफआईआर (FIR) दर्ज कराने का सनसनीखेज आरोप लगाया है। पीड़ितों ने शासन और प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की गुहार लगाई है।

बैनामे की जमीन पर न्यायालय में चल रहा है मुकदमा

प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से अशोक कपूर और उनके पक्ष ने अपने दावों को मजबूत करते हुए जमीन से जुड़े वैधानिक तथ्य साझा किए:

  • वैध मालिकाना हक: पीड़ितों का कहना है कि उन्होंने 22 फरवरी 2023 को लालता प्रसाद और प्रेम कुमार नामक व्यक्तियों से 1157 वर्ग गज जमीन का विधिवत बैनामा (रजिस्ट्री) कराया था। उनके पास रजिस्ट्री, खतौनी, टैक्स रसीद और बिजली कनेक्शन जैसे सभी वैध दस्तावेज मौजूद हैं।

  • विचाराधीन मामला: यह पूरी जमीन पहले से ही माननीय न्यायालय में विचाराधीन (पेंडिंग) है और इस पर कानूनी प्रक्रिया चल रही है।

भाजपा नेता पर जबरन कब्जे और ₹19.50 लाख की धोखाधड़ी का आरोप

पीड़ित पक्ष का आरोप है कि न्यायालय में मामला लंबित होने के बावजूद राजनीतिक रसूख के बल पर जमीन को हथियाने का खेल खेला जा रहा है:

  • रसूख के बल पर रजिस्ट्री: आरोप है कि भाजपा नेता राधे गुर्जर द्वारा अक्टूबर 2025 में इस विवादित भूमि में से 600 गज जमीन की जबरन रजिस्ट्री करा ली गई और उस पर अवैध कब्जा कर निर्माण का प्रयास किया जाने लगा।

  • लाखों की धोखाधड़ी: जमीन के इस खेल में पीड़ितों ने 19 लाख 50 हजार रुपये की भारी-भरकम धोखाधड़ी का भी आरोप लगाया है। पीड़ितों के अनुसार, राजेश बाबू, रवींद्र कुमार और उनके साथियों ने खुद को भूमि का असली मालिक बताकर और सीता द्विवेदी का पुनर्स्थापन वापस कराने का झांसा देकर उनसे यह रकम ऐंठ ली, जिसके पुख्ता दस्तावेजी प्रमाण होने का दावा किया गया है।

पुलिस की भूमिका संदिग्ध; एक महीने की देरी से दर्ज हुई FIR पर सवाल

अशोक कपूर ने प्रेस वार्ता के दौरान बरेली पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया है:

  • समय पर नहीं हुई कार्रवाई: पीड़ितों के अनुसार, 1 जून 2026 को जब विवादित भूमि पर अवैध निर्माण शुरू करने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने तुरंत डायल 112 और स्थानीय चौकी प्रभारी को सूचित किया। पुलिस के आने पर काम तो रुक गया, लेकिन इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों को प्रार्थना पत्र देने के बावजूद कोई प्रभावी कानूनी कदम नहीं उठाया गया।

  • एक महीने बाद ‘संदिग्ध’ एफआईआर: कहानी में नया मोड़ तब आया जब पीड़ित पक्ष पर ही एक काउंटर एफआईआर दर्ज करा दी गई। पीड़ितों ने इस एफआईआर की सत्यता पर बड़ा सवाल उठाते हुए कहा कि कथित घटना 4 जून 2026 की दिखाई गई है, जबकि पुलिस ने पूरे एक महीने की देरी के बाद 7 जुलाई 2026 को मुकदमा दर्ज किया। पीड़ितों का आरोप है कि घटनास्थल पुलिस चौकी के बेहद करीब होने के बावजूद एक महीने की यह देरी दर्शाती है कि एफआईआर पूरी तरह से मनगढ़ंत है और उन पर जमीन छोड़ने का दबाव बनाने के लिए दर्ज की गई है।

पीड़ितों ने की निष्पक्ष जांच की मांग

अशोक कपूर और उनके साथियों ने स्पष्ट किया है कि वे किसी राजनीतिक दल के विरोधी नहीं हैं, बल्कि केवल न्याय चाहते हैं। उन्होंने जिला प्रशासन और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) से निम्नलिखित मांगें रखी हैं:

  1. विवादित भूमि और उसकी पूरी रजिस्ट्री श्रृंखला (Chain of Registry) की पारदर्शी जांच हो।

  2. 7 जुलाई को दर्ज की गई कथित झूठी एफआईआर की स्वतंत्र जांच कराकर दोषियों पर कार्रवाई की जाए।

  3. न्यायालय के आदेशों की अवहेलना कर अवैध निर्माण का प्रयास करने वालों पर सख्त एक्शन लिया जाए।

  4. 19 लाख 50 हजार रुपये की धोखाधड़ी के मामले की सघन जांच हो।

शिकायतकर्ताओं ने यह भी कहा कि यदि जांच में वे स्वयं दोषी पाए जाते हैं, तो प्रशासन उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है। अब देखना यह होगा कि बरेली प्रशासन इस प्रेस वार्ता का संज्ञान लेकर क्या रुख अख्तियार करता है।


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