SC : सरकारी कर्मचारी को नौकरी से निकालना मौत की सजा के समान’,

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा है कि सरकारी कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त करना मौत की सजा के समान है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील टिप्पणी में कहा है कि एक सरकारी कर्मचारी के लिए नौकरी से बर्खास्त किया जाना मौत की सजा से कम नहीं है।

कोर्ट ने तमिलनाडु की पेरियार यूनिवर्सिटी के बर्खास्त डिप्टी रजिस्ट्रार आर. सरवनन को फिर से बहाल करने का निर्देश दिया, जिन्हें कथित तौर पर आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया था।

कोर्ट ने 16 अक्टूबर के अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह की कठोर सजा का असर सिर्फ कर्मचारी पर नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार पर पड़ता है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ के आदेश को खारिज करते हुए एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूनिवर्सिटी द्वारा गठित एक सदस्यीय आयोग की जांच रिपोर्ट बिना किसी ठोस सबूत के तैयार की गई थी। केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर किसी को दोषी ठहरा देना न्याय का गला घोंटने जैसा है।
खंडपीठ ने बिना किसी ठोस और न्यायसंगत कारण के एकल पीठ के फैसले में हस्तक्षेप किया था, जो गलत था।
पीठ ने कहा कि बर्खास्तगी की सजा मिलने पर सरकारी कर्मचारी को सेवा से जुड़े सभी लाभ गंवाने पड़ते हैं, जिससे वह पूरी तरह कंगाल हो जाता है। अगर नतीजे इतने गंभीर हैं, तो रिट कोर्ट को सिर्फ मूकदर्शक बनकर नहीं रहना चाहिए। उचित मामलों में, रिट कोर्ट को खुद लगाई गई पाबंदियों से बाहर निकलना चाहिए और सजा के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करनी चाहिए।
कोर्ट ने यूनिवर्सिटी के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि एकल पीठ को इस मामले की सुनवाई करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि आरोपित के पास तमिलनाडु सेवा नियमों के तहत वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा नियमों के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने का यह मतलब नहीं है कि रिट कोर्ट मूकदर्शक बनकर बैठ जाए। यदि किसी कर्मचारी पर अन्याय हुआ है और बिना किसी कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य के उसे नौकरी से निकाला गया है, तो हाईकोर्ट न्याय और निष्पक्षता के हित में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग कर सकता है।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यूनिवर्सिटी ने बिना कोई कारण बताए और अटकलों पर आधारित रिपोर्ट को स्वीकार करके प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन किया है।

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