महंगाई और बेरोजगारी पर जनता की पुकार
“न तेल के दाम घटे, न मिली नौकरी”: महंगाई और बेरोजगारी के दोहरे मोर्चे पर आम जनता की तीखी पुकार
नई दिल्ली: “न तेल खरीदने का बजट बचा है, न हाथ में कोई स्थायी नौकरी… आखिर ऐसे कैसे देश और घर चलेगा मोदी जी?”— यह महज सोशल मीडिया पर वायरल होता कोई नारा नहीं, बल्कि आज देश के आम मध्यमवर्गीय नागरिक, किसान और युवा की उस जमीनी हकीकत का दर्दनाक बयान है जो महंगाई और बेरोजगारी की दोहरी मार झेलने को मजबूर हैं।
एक तरफ जहां रोजमर्रा के खाद्य तेलों और ईंधन की कीमतें आम आदमी की थाली और जेब का बजट बिगाड़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर रोजगार के अवसरों की कमी ने युवाओं को निराशा के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।
1. रसोई और जेब पर भारी पड़ता ‘तेल का खेल’
देश के आम उपभोक्ताओं के लिए अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है:
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पेट्रोल-डीजल और एलपीजी का बोझ: ईंधन की ऊंची कीमतों का सीधा असर हर खाद्य पदार्थ के माल भाड़े पर पड़ता है, जिससे मंडियों में हरी सब्जियों से लेकर बुनियादी राशन तक सब कुछ महंगा हो चुका है।
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खाद्य तेलों में उछाल: सरसों, रिफाइंड और पाम ऑयल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव और ऊंची दरों ने आम परिवार की मासिक बजट गणित को पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया है।
2. ‘डिग्री हाथ में, नौकरी की तलाश जारी’
बेरोजगारी का बढ़ता आंकड़ा आज देश के युवा वर्ग के लिए सबसे बड़ा सामाजिक और आर्थिक संकट बन चुका है:
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परीक्षाएं और परिणाम का लंबा इंतजार: भर्ती बोर्डों द्वारा परीक्षाओं के विज्ञापन जारी होने से लेकर परीक्षा कराने, परिणाम घोषित करने और नियुक्ति (Joining) पत्र मिलने में सालों-साल लग रहे हैं।
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निजी क्षेत्र में अनिश्चितता: प्राइवेट सेक्टर में भी छंटनी (Layoffs) और कम वेतनों के कारण नए स्नातकों और युवाओं के लिए स्थिर आजीविका पाना कठिन चुनौती साबित हो रहा है।
ठोस और तुरंत राहत देने वाले कदमों की दरकार
जनता अब केवल नीतिगत दावों और घोषणाओं के स्थान पर धरातल पर सीधी और त्वरित आर्थिक राहत देखना चाहती है:
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ईंधन और जरूरी वस्तुओं पर टैक्स में कटौती: केंद्र व राज्य सरकारों को आपसी समन्वय बनाकर आम उपभोग की चीजों (पेट्रोल, डीजल, खाद्य तेल) पर से करों का बोझ कम करने की सख्त जरूरत है।
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समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया: रिक्त पड़े लाखों सरकारी पदों को एक पारदर्शी, सुरक्षित और समयबद्ध कैलेंडर के तहत भरकर युवाओं के विश्वास को दोबारा बहाल किया जाना चाहिए।
‘ऑल राइट्स मैगजीन’ मानती है कि किसी भी विकासशील और मजबूत राष्ट्र की असली नींव उसके नागरिकों की आर्थिक संपन्नता, सस्ती जीवनशैली और सुरक्षित रोजगार में निहित है।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)
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