पितृ पक्ष में गया में पिंडदान से 7 पीढ़ियों को मोक्ष: गरुड़ पुराण में वर्णित है महात्म्य
“पितृ पक्ष में गया में पिंडदान का महात्म्य: गरुड़ पुराण के अनुसार 7 पीढ़ियों के पूर्वजों को मिलता है मोक्ष, दूर होता है पितृ दोष”
गया (बिहार): सनातन हिंदू धर्म में पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) का समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और तर्पण अर्पित करने का सबसे पवित्र काल माना गया है। धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, बिहार स्थित ‘गया’ धाम (पितृ तीर्थ) में पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। मान्यता है कि गया की पवित्र भूमि पर सच्चे मन से विधिपूर्वक पिंडदान करने से मृत आत्माओं को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है और उन्हें बैकुंठ धाम में स्थान प्राप्त होता है।
गरुड़ पुराण और वायु पुराण के अनुसार, गया में पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान करने से 7 पीढ़ियों के पूर्वजों का उद्धार होता है और कुंडली में मौजूद गंभीर से गंभीर पितृ दोष समाप्त हो जाते हैं।
1. 7 पीढ़ियों के पूर्वजों का उद्धार और पितृ दोष से मुक्ति
गरुड़ पुराण में गया धाम की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया गया है कि इस पावन भूमि पर किया गया श्राद्ध कभी व्यर्थ नहीं जाता:
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मोक्ष का मुख्य केंद्र: गया में भगवान विष्णु के पदचिह्नों पर स्थित प्रसिद्ध ‘विष्णुपद मंदिर’ (Vishnupad Temple) में पिंडदान करने से पूर्वजों को सीधा मोक्ष प्राप्त होता है।
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7 पीढ़ियों का कल्याण: मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति अपने वंश में गया पहुंचकर पिंडदान करता है, तो उसके पितृ कुल और मातृ कुल की 7 पीढ़ियों के पूर्वज तृप्त होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
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पितृ दोष का निवारण: जिन जातकों की कुंडली में पितृ दोष के कारण जीवन में रुकावटें, पारिवारिक कलह या संतान बाधा आ रही हो, गया में तर्पण करने से उन्हें इन कष्टों से मुक्ति मिलती है।
2. त्रेतायुग से जुड़ा इतिहास: माता सीता ने फल्गु नदी तट पर किया था राजा दशरथ का पिंडदान
गया का इतिहास और इसका आध्यात्मिक महत्व पौराणिक काल से ही अत्यंत प्राचीन है:
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रामायण कालीन प्रसंग: रामायण के अनुसार, वनवास काल के दौरान जब प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी गया पहुंचे थे, तब माता सीता ने फल्गु नदी के तट पर बालू के पिंड बनाकर महाराजा दशरथ का पिंडदान किया था।
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साक्षी रूप में स्वीकृत श्राद्ध: माता सीता के इस भक्तिभाव से प्रसन्न होकर राजा दशरथ की आत्मा ने स्वयं प्रकट होकर पिंड स्वीकार किया था, जिससे इस स्थान की महिमा युगों-युगों के लिए अमर हो गई।
3. ‘पितृ तीर्थ’ पर उमड़ता है श्रद्धालुओं का जनसैलाब
प्रतिवर्ष पितृ पक्ष के दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति की कामना लेकर गया पहुंचते हैं। फल्गु नदी के तट, विष्णुपद मंदिर परिसर और प्रेतशिला जैसे पवित्र वेदियों पर योग्य तीर्थ पुरोहितों (गायावाल पंडा) के मार्गदर्शन में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ तिल, जौ, चावल और गुड़ के पिंड बनाकर अर्पण किए जाते हैं।
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