नोएडा: अखलाक केस में अर्जी निरस्त
अखलाक हत्याकांड: सामाजिक सौहार्द के नाम पर केस वापसी की अर्जी खारिज, सेशन कोर्ट ने सरकार को दिया बड़ा झटका
ग्रेटर नोएडा। उत्तर प्रदेश के चर्चित अखलाक हत्याकांड (बिसहड़ा कांड) में मंगलवार को जिला अदालत से बड़ी खबर सामने आई है। गौतम बुद्ध नगर की सेशन कोर्ट ने मामले को वापस लेने की राज्य सरकार की अर्जी को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अदालत ने अभियोजन पक्ष की दलीलों को ‘आधारहीन’ और ‘महत्वहीन’ बताते हुए साफ कर दिया है कि न्याय की प्रक्रिया पहले की तरह जारी रहेगी।
सरकार ने दिया था ‘सामाजिक सौहार्द’ का हवाला
अक्टूबर माह में राज्य सरकार के अधिवक्ता ने फास्ट-ट्रैक अदालत (FTC) में एक अर्जी दाखिल की थी। इस अर्जी में दलील दी गई थी कि:
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बिसहड़ा गांव और आसपास के क्षेत्रों में सामाजिक सौहार्द (Social Harmony) बहाल करने के लिए इस केस को वापस लेना जरूरी है।
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मामले को लंबा खींचने से समाज के दो वर्गों के बीच तनाव बढ़ सकता है।
“यह केवल अपराध नहीं, भीड़ द्वारा की गई हत्या है” – पीड़ित परिवार
अखलाक के परिजनों ने सरकार की इस अर्जी का पुरजोर विरोध किया। अदालत में दाखिल अपने जवाब में परिजनों ने कहा कि:
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यह कोई साधारण आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि भीड़ द्वारा की गई हत्या (Mob Lynching) का एक गंभीर मामला है।
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केस वापस लेना समाज, न्याय और कानून की गरिमा के लिए एक बड़ा संकट पैदा करेगा।
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अपराधियों को इस तरह की राहत देना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
अदालत का फैसला: अर्जी आधारहीन और महत्वहीन
मंगलवार को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सेशन कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। न्यायाधीश ने अभियोजन की अर्जी को निरस्त करते हुए कहा कि केस वापस लेने का कोई ठोस और कानूनी आधार नहीं है। अदालत ने इसे ‘महत्वहीन’ करार देते हुए ट्रायल जारी रखने का आदेश दिया।
क्या था बिसहड़ा कांड? (2015 की घटना)
जारचा कोतवाली क्षेत्र के बिसहड़ा गांव में 28 सितंबर 2015 की रात को गोमांस के शक में उग्र भीड़ ने मोहम्मद अखलाक की उनके घर में घुसकर पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। इस घटना ने पूरे देश में ‘लिंचिंग’ की बहस को जन्म दिया था। इस मामले में कुल 18 आरोपी थे, जिनमें से कुछ की मौत हो चुकी है और अन्य अभी जमानत पर बाहर हैं।
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