हृदय में समर्पण से जागेगी कृष्ण चेतना
कर्म में निर्लिप्तता और हृदय में समर्पण से ही जागृत होती है कृष्ण चेतना
नई दिल्ली: जब कर्म में निर्लिप्तता, संघर्ष के मध्य आनंद, संबंधों के बीच प्रेम और हृदय में समर्पण का जन्म होता है, तभी वास्तव में हमारे भीतर ‘कृष्ण चेतना’ का अवतरण होता है। आध्यात्मिक गुरु और आर्ट ऑफ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर जी के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि यानी अर्धचंद्र के दिन हुआ था, जो पूर्ण प्रकाश और पूर्ण अंधकार के बीच परिपूर्ण संतुलन को दर्शाता है। यह अवस्था हमें जीवन के उसी संतुलन की याद दिलाती है, जिसके साक्षात स्वरूप स्वयं श्रीकृष्ण हैं।
कर्मठता और वैराग्य का अद्भुत संगम श्रीकृष्ण दृश्य जगत में पूरी तरह सक्रिय रहकर भी अदृश्य चेतना में पूर्णतः स्थित हैं। वे एक महान गुरु, कुशल राजनीतिज्ञ, योगेश्वर और सखा हैं। जहाँ एक अवधूत बाहरी दुनिया से विरक्त रहता है और एक संसारी व्यक्ति आध्यात्मिक चेतना से अनभिज्ञ, वहीं श्रीकृष्ण इन दोनों छोरों को एक साथ समाहित करते हैं। जीवन की हर भूमिका—माता, पिता, पुत्र या नागरिक—को पूरी निष्ठा से निभाते हुए भी भीतर से यह जानना कि हम इन भूमिकाओं से परे उस अनंत चेतना का अंश हैं, यही कर्म और वैराग्य का संतुलन है।
परमानंद और सर्वव्यापी आकर्षण के प्रतीक कृष्ण विशुद्ध आनंद के साक्षात स्वरूप हैं। जब जीवन में यह आनंद जागता है, तो शिकायतें और क्रोध विलीन होने लगते हैं और जीवन बोझ न रहकर एक सहज खेल लगने लगता है। बच्चे उनमें नटखटपन देखते हैं, युवा मित्रता, गृहस्थ संघर्षों का मार्गदर्शन और योगी उनमें योगेश्वर का दर्शन करते हैं। उनका आकर्षण मनुष्य को सांसारिक मोह से ऊपर उठाकर आंतरिक चेतना की ओर ले जाता है।
भीतर घटाएं जन्माष्टमी का पर्व श्रीकृष्ण प्रत्येक प्राणी में विद्यमान प्राणशक्ति, बलवानों का बल और बुद्धिमानों की बुद्धि हैं। जन्माष्टमी का वास्तविक उत्सव तब है जब हम अपने भीतर कृष्ण के गुणों को जाग्रत करें—कर्म में उनकी कर्मठता, कठिनाई में उनकी स्थिरता और संबंधों में उनका निष्कपट प्रेम समाहित हो।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)

