अराजकता और विघटनकारी राजनीति का पर्दाफाश: राष्ट्रवाद और विकास की आंधी में टिक नहीं पाएगा भ्रम का कारोबार, जनता दे रही है कड़ा संदेश
देशहित बनाम विघटनकारी राजनीति: राष्ट्रवाद और विकास के आगे नहीं टिकेगी अराजकता, जनता दे रही है करारा जवाब”
विशेष संपादकीय एवं विश्लेषणात्मक रिपोर्ट: राष्ट्रीय राजनीति और सुशासन (ऑल RIGHTs मैगजीन)
नई दिल्ली: भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध प्रदर्शन का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त एक महत्वपूर्ण अंग है। हालांकि, पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि कुछ राजनीतिक दल, वैचारिक समूह और स्वार्थी तत्व वैध आंदोलनों की आड़ में अराजकता फैलाने, संवैधानिक संस्थाओं (Constitutional Institutions) की गरिमा को धूमिल करने और देश में अस्थिरता का माहौल पैदा करने का सुनियोजित प्रयास कर रहे हैं। इन विघटनकारी ताकतों के मंसूबों को भांपते हुए देश की आम जनता अब इन चेहरों का पर्दाफाश कर रही है और उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से करारा जवाब दे रही है।
1. आंदोलन की आड़ में अराजकता का एजेंडा
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संस्थाओं पर अनर्गल प्रहार: देश की न्यायपालिका, चुनाव आयोग, विधायिका और जांच एजेंसियों जैसी प्रमुख संवैधानिक संस्थाएं हमारे लोकतंत्र की रीढ़ हैं। जब कभी कुछ राजनीतिक दल अपने निहित स्वार्थों या कानूनी शिकंजे से बचने के लिए इन संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं, तो यह सीधे तौर पर देश की व्यवस्था पर हमला होता है।
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भ्रम फैलाने की राजनीति: विकास कार्यों और राष्ट्र निर्माण की गति को बाधित करने के लिए प्रायोजित तरीके से झूठे नैरेटिव गढ़े जाते हैं, ताकि युवाओं और भोले-भाले नागरिकों को भ्रमित कर शासन के खिलाफ भड़काया जा सके।
2. विकास और राष्ट्रवाद के आगे पस्त होती विघटनकारी मानसिकता
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राष्ट्र सर्वोपरि: आज का भारत विकास, आत्मनिर्भरता, सुशासन और मजबूत राष्ट्रवाद के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश की जनता अब विकास और स्थिरता के पक्ष में खड़ी है, न कि नकारात्मक और विध्वंसक राजनीति के साथ।
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जनता की परिपक्वता: 140 करोड़ भारतीयों ने यह भली-भांति समझ लिया है कि कौन सी ताकतें देश को आगे ले जाना चाहती हैं और कौन सी ताकतें अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए समाज में वैमनस्य फैला रही हैं। जनता ऐसी ताकतों को पूरी तरह नकार चुकी है।
3. सकारात्मक और पारदर्शी राष्ट्र निर्माण की अनिवार्यता
देश को प्रगति के पथ पर अनवरत आगे बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि हर नागरिक और राजनीतिक दल व्यक्तिगत या दलीय स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता दे। लोकतंत्र में रचनात्मक आलोचना का स्वागत है, लेकिन विध्वंस और अराजकता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
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