पेपर लीक तंत्र में बड़े सुधार की मांग
पेपर लीक ने छीनीं कई परिवारों की खुशियां: बेबस पिता का दर्द देख रो पड़ा हर कोई
परीक्षाओं में लगातार होते पेपर लीक और सिस्टम की नाकामी का सबसे खौफनाक चेहरा अब उन बेबस और लाचार परिवारों के आंसुओं में साफ देखा जा सकता है, जो अपने बच्चों का भविष्य संवारने का सपना देख रहे थे। हाल ही में सामने आई एक झकझोर देने वाली घटना में, रिया के पिता राजेश जी अपनी बेटी को खोकर इस कदर टूट चुके हैं कि उन्हें देखने वाले हर शख्स की आंखें भर आ रही हैं।
यह दर्द सिर्फ एक अकेले परिवार का नहीं है; पेपर लीक की इस जानलेवा बीमारी ने देश के न जाने कितने हंसते-खेलते परिवारों से उनका बच्चा और उनकी जीने की वजह छीन ली है।
सपनों की हत्त्या और बेबस माता-पिता
आज देश में जब भी कोई परीक्षा का पेपर लीक होता है, तो वह सिर्फ एक प्रश्नपत्र का लीक होना नहीं होता, बल्कि लाखों छात्रों के सालों की मेहनत और उनके माता-पिता के त्याग की हत्या होती है।
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हर नाम के पीछे एक परिवार: इस अव्यवस्था के कारण जान गंवाने वाले या मानसिक रूप से टूटने वाले हर एक छात्र के पीछे एक मां है, एक पिता है। उनके लिए अब आने वाला ‘कल’ पूरी तरह से अंधकारमय हो चुका है।
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भविष्य की बलि: एक मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए अपनी जीवनभर की पूंजी लगा देता है। लेकिन जब अंत में भ्रष्टाचार और धांधली के कारण परीक्षा रद्द होती है या रिजल्ट लटकता है, तो युवा अवसाद (Depression) के गहरे दलदल में धंस जाते हैं।
खोखले सिस्टम को नए सिरे से बनाने की जरूरत
अब समय आ गया है कि खोखले वादों और लीपापोती से हटकर इस पूरे परीक्षा तंत्र और सिस्टम को नए सिरे से पुनर्गठित (Restructure) किया जाए। एक ऐसे पारदर्शी और सुरक्षित सिस्टम का निर्माण बेहद जरूरी है जहां:
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बच्चों के सपनों की सुरक्षा हो: छात्रों का भविष्य चंद भ्रष्ट अधिकारियों और शिक्षा माफियाओं के हाथों की कठपुतली न बने।
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जवाबदेही तय हो: पेपर लीक होने पर सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों पर गाज न गिरे, बल्कि शीर्ष स्तर पर बैठे जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय कर उन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाए।
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मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिले: परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को ऐसा सुरक्षित और सकारात्मक माहौल मिले, जहां वे किसी भी विपरीत परिस्थिति में इतना आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर न हों।
जब तक इस देश में बच्चों की प्रतिभा और उनकी मेहनत को सुरक्षित रखने के लिए कड़े कानून और अभेद्य सुरक्षा प्रणाली नहीं बनाई जाएगी, तब तक राजेश जी जैसे न जाने कितने ही पिताओं के आंसू इस सिस्टम को कचोटते रहेंगे।
- (गोपाल चन्द्र अग्रवाल,संपादक)
(एडिटर (Allrights Magazine)

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