संविधान नागरिकों व राज्य के बीच जीवंत समझौता
संविधान पखवाड़ा 2026: ‘संविधान केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, लोगों और राज्य के बीच जीवंत समझौता
विशेष राजनीतिक एवं विचार रिपोर्ट (ऑल RIGHTs मैगजीन)
नई दिल्ली/चंडीगढ़: ‘संविधान पखवाड़ा 2026’ के तहत देश भर में संवैधानिक मूल्यों और नागरिक कर्तव्यों पर व्यापक चर्चा जारी है। इस अवसर पर यह बात प्रमुखता से रेखांकित की गई है कि भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत के लोगों और राज्य के बीच एक जीवंत संवैधानिक समझौता है, जो न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है।
1. संवैधानिक मूल्य और लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती
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अधिकारों के साथ कर्तव्यों का बोध: देश के नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के प्रति सजग रहने के साथ-साथ अपने संवैधानिक कर्तव्यों का भी समान रूप से बोध होना अत्यंत आवश्यक है।
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नागरिक जागरूकता ही लोकतंत्र का आधार: लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती और उसकी सफलता उसके नागरिकों की संवैधानिक समझ, सामाजिक जागरूकता और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता में ही निहित है।
2. ‘विकसित भारत’ की दिशा में कदम
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संवैधानिक चेतना का प्रसार: संविधान के आदर्शों को दैनिक जीवन, कार्यशैली और प्रशासनिक व्यवस्था में आत्मसात करके ही एक सशक्त समाज की स्थापना की जा सकती है।
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सामूहिक संकल्प: समाज के प्रत्येक वर्ग तक संवैधानिक मूल्यों की पहुँच सुनिश्चित करना ही इस तरह के आयोजनों का मुख्य उद्देश्य है।
‘ऑल RIGHTs मैगजीन’ का दृष्टिकोण
संविधान हमारे लोकतंत्र की आत्मा है। नागरिकों में अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का संतुलन ही देश को प्रगति के पथ पर आगे ले जा सकता है।
‘ऑल RIGHTs मैगजीन’ संवैधानिक मामलों, विधायी गतिविधियों और राष्ट्रीय महत्व के हर विचार पर निष्पक्ष नजर रखती है।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,संपादक)
(एडिटर (Allrights Magazine)
