पूर्व स्पीकर बालयोगी की जयंती: संविधान सदन में दी श्रद्धांजलि
लोक सभा के पूर्व अध्यक्ष श्री जी.एम.सी. बालयोगी जी की जयंती पर संविधान सदन के केन्द्रीय कक्ष में उनका स्मरण कर श्रद्धासुमन अर्पित किए।
बालयोगी जी, संसदीय गरिमा, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों की एक प्रेरक विरासत हैं। लोक सभा के अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल संसदीय परंपराओं को मजबूत करने, सदन की गरिमा बनाए रखने और सभी दलों के प्रति निष्पक्ष व्यवहार की उनकी प्रतिबद्धता के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है।
श्री जी.एम.सी. बालयोगी का सार्वजनिक जीवन संघर्ष, शिक्षा और निरंतर कर्मशीलता की यात्रा रहा। सार्वजनिक जीवन में उन्होंने स्थानीय निकाय से लेकर आंध्र प्रदेश विधानसभा तथा संसद तक की यात्रा की। 1991 में वे पहली बार लोक सभा के लिए निर्वाचित हुए। 1998 में श्री बालयोगी लोक सभा के अध्यक्ष के रूप में चुनें गए। उस समय लोक सभा में लगभग 40 राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व था और सदन की राजनीतिक संरचना अत्यंत विविध थी। तब वे लोक सभा के सबसे युवा अध्यक्ष बने।
ऐसी परिस्थितियों में सदन की अध्यक्षता करना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण दायित्व था, लेकिन श्री बालयोगी जी ने अपनी कार्यशैली से विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच विश्वास कायम किया। 1999 में वे दूसरी बार लोक सभा अध्यक्ष निर्वाचित हुए। इस अवसर पर उनका पुनर्निर्वाचन सर्वसम्मति से हुआ। विविध राजनीतिक दलों से बनी लोक सभा के बीच दोबारा अध्यक्ष पद के लिए सर्वसम्मति प्राप्त करना उनके प्रति सदन के व्यापक विश्वास को दर्शाता है।
श्री बालयोगी जी का स्पष्ट विश्वास था कि लोक सभा अध्यक्ष का पहला दायित्व सदन की गरिमा और सम्मान को बनाए रखना है। उन्होंने अध्यक्ष पद संभालते हुए सदन के सभी वर्गों को यह भरोसा दिलाया कि अध्यक्ष के रूप में उनके निर्णय निष्पक्ष होंगे और वे collective wisdom की भावना से सदन का संचालन करेंगे।
श्री बालयोगी जी की संसदीय विरासत का एक महत्वपूर्ण पक्ष Parliamentary Ethics और Conduct से भी जुड़ा है। उनके प्रयासों से लोक सभा के Rules of Procedure and Conduct of Business में ऐसा प्रावधान जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत सदन के well में आकर कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न करने वाले सदस्यों के लिए automatic suspension का प्रावधान किया गया।
उनके कार्यकाल में 25 नवंबर 2001 को नई दिल्ली में Discipline and Decorum in Parliament and Legislatures of States and Union Territories विषय पर महत्वपूर्ण सम्मेलन भी आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में भारत की विधायी संस्थाओं के सदस्यों के लिए Code of Conduct से संबंधित प्रस्ताव स्वीकार किया गया।
संसद की विश्वसनीयता केवल कानून बनाने की क्षमता से नहीं, बल्कि उसके सदस्यों के आचरण और संस्थागत मर्यादा से भी जुड़ी होती है। श्री बालयोगी जी इस पहलू को विशेष महत्व देते थे। इसी क्रम में उन्हें लोक सभा की पहली Ethics Committee गठित करने का श्रेय भी दिया जाता है।
श्री बालयोगी केवल सदन की कार्यवाही को व्यवस्थित रखने तक सीमित नहीं रहे। वे मानते थे कि जनप्रतिनिधियों को उनके दायित्वों के निर्वहन के लिए पर्याप्त professional training और orientation भी मिलना चाहिए। उन्होंने नए सांसदों और विधायकों के लिए आयोजित Orientation Programmes को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया। मुझे लगता है कि यह दृष्टिकोण आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि मजबूत संसद के लिए अपने दायित्वों को समझने वाले सक्षम जनप्रतिनिधि अत्यंत आवश्यक हैं।
लोक सभा के पूर्व अध्यक्ष श्री जी.एम.सी. बालयोगी जी को याद करना उन मूल्यों को याद करना है जो एक स्वस्थ संसदीय लोकतंत्र की बुनियाद हैं। उनकी संसदीय दृष्टि, लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता और संस्थाओं की गरिमा के प्रति समर्पण भारतीय संसद की स्मृति में सदैव जीवंत रहेगा।
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