27 जून जयन्ती पर विशेष-वन्दे मातरम् के रचयिता बंकिमचन्द्र चटर्जी

बंकिम चन्द्र चटर्जी बांग्ला भाषा के प्रख्यात उपन्यासकार थे। उनका मूल नाम बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय था, परन्तु साहित्य जगत में उन्होंने अपना नाम बंकिम चन्द्र चटर्जी रखा और इसी नाम से उन्होंने अपने उपन्यास, कविताएं एवं निबन्ध लिखे।
भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ उनकी ही रचना है जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के काल में क्रान्तिकारियों का प्रेरणास्रोत बन गया था। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के पूर्ववर्ती बांग्ला साहित्यिकारों में उनका गौरवपूर्ण स्थान है।
वन्दे मातरम् गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनन्द मठ’ में शामिल है। वन्दे मातरम् गीत सबसे पहले 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था। उसके बाद यह गीत आजादी के आन्दोलन के दौरान निरन्तर गूंजता रहा।
आधुनिक युग में बंगला साहित्य का उत्थान उन्नीसवीं सदी के मध्य से शुरु हुआ। इसमें राजा राममोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, प्यारीचाँद मित्र, माइकल मधुसुदन दत्त, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अग्रणी भूमिका निभायी। इसके पहले बंगला के साहित्यकार बंगला की जगह संस्कृत या अंग्रेजी में लिखना पसन्द करते थे। बंगला साहित्य मंे जनमानस तक पैठ बनाने वालों में शायद बंकिम चन्द्र चटर्जी पहले साहित्यकार थे।
बंकिम चन्द्र चटर्जी का जन्म उत्तरी चैबीस परगना के कंठालपाड़ा, नेहाटी में एक परंपरागत और समृद्ध बंगाली परिवार में हुआ था। उनकी शिक्षा हुगली काॅलेज और प्रेसीडेंसी काॅलेज में हुई। 1857 में उन्होंने बी.ए. पास किया। प्रेसीडेंसी काॅलेज से बी.ए. की उपाधि लेने वाले ये पहले भारतीय थे। शिक्षा समाप्ति के तुरंत बाद डिप्टी मजिस्टेªट पद पर इनकी नियुक्ति हो गई। कुछ काल तक बंगाल सरकार के सचिव पद पर भी रहे। रायबहादुर और सी.आई.ई. की उपाधियाँ पाईं। उन्होंने 1869 में कानून की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने सरकारी नौकरी कर ली और 1891 में सेवानिवृत्त हुए।


बंकिम चन्द्र चटर्जी की पहचान बांग्ला कवि, उपन्यासकार, लेखक और पत्रकार के रूप में है। उनकी प्रथम प्रकाशित रचना ‘राजमोहन्स वाइफ’ थी। इसकी रचना अंग्रेजी में की गई थी। उनकी पहली प्रकाशित बांग्ला कृति ‘दुर्गेशनंदिनी’ मार्च 1865 में छपी थी। यह एक रूमानी रचना है। दूसरे उपन्यास ‘कपालकुंडला’ 1866 में प्रकाशित हुई। यह उपन्यास उनकी सबसे अधिक रूमानी रचनाओं में से एक माना जाता है। उन्होंने 1872 में मासिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ का भी प्रकाशन किया। अपनी इस पत्रिका में उन्होंने ‘विषवृक्ष’ उपन्यास का क्रमिक रूप से प्रकाशन किया। कृष्णकांतेर विल में चटर्जी ने अंग्रेजी शासकों पर तीखा व्यंग्य किया है।
आनंदमठ उपन्यास 1882 में प्रकाशित हुआ था। यह एक राजनीतिक उपन्यास है। इस उपन्यास में उत्तर बंगाल में 1773 के संन्यासी विद्रोह का वर्णन किया गया है। इस पुस्तक में देशभक्ति की भावना है। चटर्जी का अंतिम उपन्यास ‘सीताराम’ 1886 में प्रकाशित हुआ। इसमें मुस्लिम सत्ता के प्रति एक हिंदू शासक का विरोध दर्शाया गया है।
उनके अन्य उपन्यासों में ‘दुर्गेशनंदिनी’, ‘मृणालिनी’, ‘इंदिरा’, ‘राधारानी’, ‘कृष्णकांतेर दफ्तर’, ‘देवी चैधरानी’ और ‘मोचीराम गौरेर जीवनचरित’ शामिल है। उनकी कविताएं ‘ललिता ओ मानस’ नामक संग्रह में प्रकाशित हुईं। उन्होंने धर्म, सामाजिक और समसामयिक मुद्दों पर आधारित कई निबन्ध भी लिखे। बंकिम चन्द्र चटर्जी के उपन्यासों का भारत की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद किया गया। बांग्ला में सिर्फ बंकिम चन्द्र चटर्जी और शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय को यह गौरव हासिल है कि उनकी रचनाएं हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में आज भी बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं। लोकप्रियता के मामले में बंकिम और शरत, रवीन्द्र नाथ ठाकुर से भी आगे हैं। बंकिम चन्द्र चटर्जी बहुमुखी प्रतिभा वाले रचनाकार थे। उनके कथा साहित्य के अधिकतर पात्र शहरी मध्यम वर्ग के लोग हैं। इनके पात्र आधुनिक जीवन की त्रासदियों और प्राचीनकाल की परंपराओं से जुड़ी दिक्कतों के साथ-साथ जूझते हैं। यह समस्या भारत भर के किसी भी प्रांत के शहरी मध्यम वर्ग के समक्ष आती है। लिहाजा मध्यम वर्ग का पाठक बंकिम चन्द्र चटर्जी के उपन्यासों में अपनी छवि देखता है।
55 वर्ष की अवस्था में 8 अप्रैल सन् 1894 में कलकत्ता में उनका निधन हुआ। उनके बारे में कहा जा सकता है-’बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्ही सो गए दास्ता कहते कहते।’ बंकिम चन्द्र चटर्जी की स्मृति में 1969 में भारत सरकार द्वारा एक डाक टिकिट जारी किया गया। आज वे हमारे मध्य नहीं हैं, मगर अपनी कालजयी कृतियों के रूप में वे सदैव अमर रहेंगे।


सुरेश बाबू मिश्रा
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य, बरेली
मोबाइल नं. 9411422735,
E-mail : sureshbabubareilly@gmail.c

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