बालाघाट में दूषित पानी से बच्चों की मौत पर उबाल
बालाघाट में गंदा पानी पीने से आदिवासी बच्चों की मौत पर फूटा गुस्सा: ‘क्या मंत्री और अफसर खुद ऐसा पानी पी सकते हैं?’
भोपाल/बालाघाट: मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले बालाघाट के दूरस्थ इलाकों में दूषित पेयजल और लचर स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण मासूम बच्चों की असमय मौतों और महामारी जैसे हालात ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है। जहरीला और दूषित पानी पीने से लगातार बच्चों के बीमार पड़ने और दम तोड़ने की खबरों के बाद स्थानीय जनता और विपक्षी दलों का आक्रोश चरम पर है।
आदिवासी समाज और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सरकार और प्रशासन पर सीधा तीखा हमला बोलते हुए तीखा सवाल उठाया है— “क्या भारतीय जनता पार्टी के मंत्री, विधायक और जिले के प्रशासनिक अधिकारी खुद और अपने परिवार के बच्चों को ऐसा गंदा पानी पिला सकते हैं?”
दूषित पानी से हाहाकार: नल-जल योजना और स्वास्थ्य तंत्र ध्वस्त
बालाघाट के वनांचल और आदिवासी बाहुल्य गांवों में पेयजल संकट और स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के कारण स्थिति भयावह होती जा रही है:
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दूषित जल पीने को मजबूर ग्रामीण: केंद्र व राज्य सरकार की ‘जल जीवन मिशन’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के बावजूद बालाघाट के कई आदिवासी गांवों में आज भी लोग झिरिया, नाले और दूषित कुओं का गंदा पानी पीने को विवश हैं।
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अस्पतालों में सुविधाओं का अकाल: दूषित पानी के सेवन से उल्टी, दस्त, डायरिया और गंभीर संक्रमण की चपेट में आए बच्चों को समय पर प्राथमिक चिकित्सा और जीवन रक्षक दवाएं नहीं मिल पा रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों व एम्बुलेंस की कमी मौतों का मुख्य कारण बन रही है।
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बच्चों की असमय मौतें बेहद चिंताजनक: एक के बाद एक मासूमों की जान जाने से आदिवासी परिवारों में मातम और भारी गुस्सा व्याप्त है। ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायतों के बावजूद स्वास्थ्य और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग का कोई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर सुध लेने नहीं पहुंचा।
जवाबदेही तय करने और मुआवजा देने की मांग
आदिवासी क्षेत्रों में मानवीय त्रासदी बनते इस संकट को लेकर ‘ऑल राइट्स मैगजीन’ प्रशासन और राज्य सरकार से तत्काल निम्नलिखित कदम उठाने की मांग करती है:
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आपातकालीन चिकित्सा व स्वच्छ जल आपूर्ति: प्रभावित गांवों में तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम, मोबाइल मेडिकल यूनिट और टैंकरों के माध्यम से स्वच्छ पेयजल की त्वरित व्यवस्था की जाए।
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दोषियों पर कड़ा एक्शन: पेयजल व्यवस्था में लापरवाही बरतने वाले पीएचई (PHE) अधिकारियों और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों पर तत्काल दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
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पीड़ित परिवारों को आर्थिक संबल: असमय काल के गाल में समाए मासूम बच्चों के परिजनों को राज्य सरकार की ओर से तत्काल उचित आर्थिक मुआवजा और सहायता प्रदान की जाए।
जल ही जीवन है, लेकिन जब पानी ही मौतों का कारण बनने लगे तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)
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