13 साल का दर्द खत्म, मिली मुक्ति
ऐतिहासिक फैसला: 13 साल के दर्द से मिलेगी मुक्ति
भारत के कानूनी इतिहास में एक अत्यंत भावुक और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 32 वर्षीय हरीश राणा के लिए ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (इच्छामृत्यु) को मंजूरी दे दी है। साल 2013 से कोमा और क्वाड्रिप्लेजिया (100% विकलांगता) से जूझ रहे हरीश के माता-पिता की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद यह आदेश आया है।
एक हादसे ने उजाड़ दीं खुशियां
हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर के छात्र थे और एक होनहार वेटलिफ्टर भी थे। रक्षाबंधन के दिन अपनी पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के कारण वे गंभीर रूप से घायल हो गए। इस हादसे ने उन्हें पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया और तब से वे केवल मशीनों, यूरिन बैग और ट्यूब के जरिए मिल रहे भोजन के सहारे जीवित थे।
माता-पिता का संघर्ष और आर्थिक तंगी
हरीश के पिता अशोक राणा और मां निर्मला देवी ने अपने बेटे को बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी।
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इलाज का खर्च: दिल्ली और चंडीगढ़ के बड़े अस्पतालों (AIIMS, PGI, अपोलो) के चक्कर काटे। हर महीने 40 से 50 हजार रुपये खर्च हो रहे थे।
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संपत्ति बेची: 2021 में परिवार को अपना तीन मंजिला मकान भी बेचना पड़ा।
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मजबूरी: पिता की पेंशन महज 3,500 रुपये है, जिससे घर और इलाज का खर्च चलाना नामुमकिन हो गया था।

कानूनी लड़ाई और ‘गरिमापूर्ण अंत’
इससे पहले 8 जुलाई 2024 को उच्च न्यायालय ने इच्छामृत्यु की अपील खारिज कर दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने माता-पिता के दर्द और हरीश की असहनीय स्थिति को समझते हुए अब इसे अनुमति दे दी है। कोर्ट ने माना कि गरिमा के साथ मरना भी एक मौलिक अधिकार है।
अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब एम्स (AIIMS) में हरीश की इच्छामृत्यु की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। यह फैसला न केवल एक परिवार के 13 साल के संघर्ष का अंत है, बल्कि समाज के सामने गंभीर बीमारी और जीवन के अंत से जुड़ी जटिलताओं पर भी बड़े सवाल खड़ा करता है।

