UP स्वास्थ्य विभाग: नियम ताक पर, सवाल खड़े
🚨 यूपी स्वास्थ्य विभाग में ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ का बड़ा खेल? सरकारी डॉक्टर बने प्राइवेट संगठन के पदाधिकारी, नियम सिर्फ कागजों में!
बरेली। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग की नियमावली स्पष्ट कहती है कि कोई भी सरकारी डॉक्टर या अधिकारी विभागीय अनुमति के बिना किसी गैर-सरकारी संस्था में पद नहीं संभाल सकता। लेकिन, बरेली मंडल (बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर, पीलीभीत और रामपुर) में यह नियम खुलेआम दरकिनार होता दिख रहा है, जिससे स्वास्थ्य तंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
आरोप है कि प्राइवेट मुस्लिम डॉक्टर्स के संगठन ‘इंटेलेक्चुअल सोशल वेलफेयर एसोसिएशन (इस्वा)’ में स्वास्थ्य विभाग के कई सरकारी डॉक्टर और अधिकारी पदाधिकारी बने हुए हैं, जबकि विभागीय रिकॉर्ड में इसकी कोई वैधानिक अनुमति दर्ज नहीं है।
👥 डिप्टी सीएमओ और सरकारी डॉक्टर बने पदाधिकारी
करीब चार साल पहले पंजीकृत हुए इस संगठन में नियमों का उल्लंघन करते हुए सरकारी अधिकारियों को पद सौंपे गए। आरोप है कि बिना किसी सक्षम अधिकारी की अनुमति के:
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बरेली के डिप्टी सीएमओ (DCMO) डॉ. लईक अहमद अंसारी को संगठन का कोषाध्यक्ष बनाया गया।
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पीलीभीत के डॉक्टर फिरासत हुसैन अंसारी को संगठन का प्रवक्ता बनाया गया।
मामला केवल इन दो नामों तक सीमित नहीं है। बदायूं, शाहजहांपुर, पीलीभीत और रामपुर में तैनात कई अन्य सरकारी डॉक्टरों के नाम भी इस संगठन से जोड़े जा रहे हैं। इसके अलावा, कुछ सरकारी डॉक्टरों पर सेवा में रहते हुए निजी अस्पताल या क्लीनिक संचालित करने का भी गंभीर आरोप है, जो नियमों का सीधा उल्लंघन है।

🏭 ‘स्वास्थ्य मंडी’ और सांठगांठ के सवाल
सूत्रों का कहना है कि बरेली को “स्वास्थ्य मंडी” में तब्दील करने की कहानी सिर्फ निजी निवेश की नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर कथित सांठगांठ की भी है।
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नियमों के विपरीत बनी इमारतों में निजी अस्पतालों को लाइसेंस देना।
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मानकों की अनदेखी करना।
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और प्रशासनिक चुप्पी साधना।
इन सभी कारकों ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर संदेह की लंबी सूची खड़ी कर दी है।
📜 2023 के सरकारी आदेश का उल्लंघन
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि 2023 में ही सरकारी अधिसूचना के माध्यम से ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ (हितों के टकराव) से बचने के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। नियमों के उल्लंघन पर:
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पद से हटाने
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वेतन कटौती
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विभागीय कार्रवाई
तक का प्रावधान है।
इसके बावजूद, अब तक न तो जिला प्रशासन या स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई स्पष्ट बयान आया है और न ही इस गंभीर मामले की औपचारिक जाँच की घोषणा की गई है।
बरेली से उठी यह चिंगारी पूरे स्वास्थ्य तंत्र की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल छोड़ गई है। क्या नियम सिर्फ फाइलों में कैद हैं, या इस बार जवाबदेही तय होगी? यह देखना बाकी है।
बरेली से रोहिताश कुमार की रिपोर्ट
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