जितिया व्रत में जिउतिया लॉकेट का महत्व
जितिया व्रत में क्यों अनिवार्य है जिउतिया लॉकेट? संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि से जुड़ा है इसका धार्मिक महत्व”
उत्तर प्रदेश / बिहार: सनातन धर्म में माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए रखा जाने वाला जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत असीम आस्था का प्रतीक है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह निर्जला व्रत इस वर्ष 3 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और नेपाल के क्षेत्रों में इस पावन पर्व का विशेष विधान है।
जितिया व्रत में कठोर उपवास और जिमूतवाहन भगवान की पूजा-अर्चना के साथ-साथ ‘जिउतिया लॉकेट’ (धागा और लॉकेट) धारण करने का विशेष और अनिवार्य धार्मिक महत्व माना गया है।
जिउतिया लॉकेट और धागे का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिउतिया लॉकेट केवल एक आभूषण या श्रृंगार का साधन नहीं है, बल्कि यह मां की ममता, अटूट आस्था और संतान की रक्षा के संकल्प का कवच माना जाता है:
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लाल और पीले धागे का संगम: व्रत के दिन माताएं पूजा के दौरान लाल या पीले रंग का पवित्र सूती धागा तैयार करती हैं या धारण करती हैं।
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सोने या चांदी का लॉकेट: इस पवित्र धागे में सोने या चांदी से बना जिउतिया लॉकेट (जीमूतवाहन देव का प्रतीक) पिरोया जाता है।
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रक्षा कवच की मान्यता: माना जाता है कि पूजा के बाद जब मां इस लॉकेट को गले में धारण करती है, तो भगवान जीमूतवाहन की कृपा से संतान पर आने वाले सभी संकट और कष्ट टल जाते हैं। इस पवित्र धागे और लॉकेट के बिना जितिया का पूजन अधूरा माना जाता है।
3 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा निर्जला व्रत
जितिया का व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है, जिसमें माताएं 24 घंटे से भी अधिक समय तक अन्न और जल का त्याग करके अपनी संतान के दीर्घ जीवन, आरोग्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं। पूजा के दौरान जितिया व्रत कथा सुनने के पश्चात ही इस पवित्र धागे को धारण किया जाता है और अगले दिन पारण के साथ व्रत पूर्ण होता है।
‘ऑल राइट्स मैगजीन’ अपनी संतान की रक्षा और खुशहाली के लिए जितिया (जीवित्पुत्रिका) का कठिन व्रत रखने वाली सभी माताओं को हार्दिक शुभकामनाएं देती है।
