RBI: काकीनाडा सीपोर्ट्स का केस खत्म
FEMA उल्लंघन मामला: काकीनाडा सीपोर्ट्स लिमिटेड को RBI से बड़ी राहत, कंपाउंडिंग ऑर्डर के साथ कानूनी कार्यवाही समाप्त
नई दिल्ली/मुंबई: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999 के तहत काकीनाडा सीपोर्ट्स लिमिटेड (Kakinada Seaports Limited) के खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाहियों को समाप्त कर दिया है। 12 दिसंबर 2025 को जारी एक कंपाउंडिंग ऑर्डर के माध्यम से RBI ने कंपनी द्वारा किए गए FEMA के कथित उल्लंघनों का निपटारा कर दिया है।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच और शिकायत
यह मामला ED द्वारा प्राप्त विश्वसनीय सूचनाओं के आधार पर शुरू की गई जांच से जुड़ा था। जांच पूरी होने के बाद, ED ने 5 सितंबर 2024 को FEMA की धारा 16 के तहत निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) के समक्ष शिकायत दर्ज की थी।
किन नियमों का हुआ था उल्लंघन? (Key Contraventions)
कंपनी द्वारा कुल तीन प्रमुख श्रेणियों में FEMA प्रावधानों का उल्लंघन पाया गया था, जिसका विवरण इस प्रकार है:
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विदेशी आवक भुगतान (Foreign Inward Payments): ₹22.87 करोड़ से अधिक के भुगतान की रिपोर्टिंग में देरी।
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Form FCGPR फाइलिंग: ₹23.31 करोड़ के शेयर जारी करने के बाद अनिवार्य फॉर्म भरने में विलंब।
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शेयर आवंटन (Share Allotment): ₹7.20 करोड़ मूल्य के शेयरों के आवंटन में निर्धारित समय से अधिक की देरी।
इन उल्लंघनों के मद्देनजर, 30 सितंबर 2024 को कंपनी और इसके जिम्मेदार अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी किया गया था।
ED की ‘नो ऑब्जेक्शन’ और RBI का फैसला
कानूनी प्रक्रिया के बीच, काकीनाडा सीपोर्ट्स ने FEMA की धारा 15 के तहत RBI के समक्ष कंपाउंडिंग (Compounding) के लिए आवेदन किया। RBI द्वारा राय मांगे जाने पर, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अधिनियम की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए इस पर ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (No Objection Certificate) जारी कर दिया।
₹21.68 लाख के भुगतान के साथ केस बंद
ED की सहमति मिलने के बाद, RBI ने 12 दिसंबर 2025 को अपना आदेश सुनाया।
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पेनल्टी: कंपनी को इन उल्लंघनों के बदले एकमुश्त ₹21,68,027 का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।
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परिणाम: इस भुगतान के साथ ही कंपनी और उसके निदेशकों के खिलाफ FEMA के तहत चल रही सभी न्यायिक कार्यवाहियां और भविष्य की मुकदमेबाजी अब पूरी तरह समाप्त हो गई है।
विशेषज्ञों की राय: जानकारों का मानना है कि ‘कंपाउंडिंग’ का यह विकल्प उन कंपनियों के लिए राहत भरा है जो अनजाने में तकनीकी चूक (जैसे रिपोर्टिंग में देरी) कर बैठती हैं, जिससे वे लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों से बच सकती हैं।
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