चुनाव नतीजों के बाद ईवीएम पर छिड़ी सियासी जंग
“ईवीएम पर सियासी घमासान: चुनाव परिणामों के बाद इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीनों और शुचिता पर उठते सवालों के बीच चुनावी प्रक्रिया की तकनीकी सच्चाई”
विशेष राजनीतिक एवं चुनावी समीक्षा (ऑल RIGHTs मैगजीन)
नई दिल्ली: भारतीय राजनीतिक गलियारों में चुनाव परिणामों के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की विश्वसनीयता को लेकर बहस छिड़ना एक आम बात बन गई है। हाल ही में आए चुनावी नतीजों के बाद विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के रुख को लेकर सत्ता पक्ष की ओर से तीखे हमले किए गए हैं। आलोचकों का तर्क है कि जब चुनावी प्रक्रिया में कई स्तरों पर पारदर्शिता और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होते हैं, तब हार का ठीकरा मशीनों पर फोड़ना अनुचित है।
1. ईवीएम की सुरक्षा और पारदर्शिता के चरण
चुनाव आयोग (ECI) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, ईवीएम की विश्वसनीयता को सुनिश्चित करने के लिए मतदान से लेकर मतगणना तक कई कड़े चरण अपनाए जाते हैं:
-
फर्स्ट लेवल चेकिंग (FLC): मतदान से काफी पहले सभी मशीनों की तकनीकी जांच राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में की जाती है।
-
डबल रैंडमडाइजेशन: मशीनों का आवंटन पूरी तरह कंप्यूटरीकृत और रैंडम तरीके से किया जाता है, ताकि किसी भी स्तर पर हेरफेर की गुंजाइश न बचे।
-
मॉक पोल (Mock Poll): वास्तविक मतदान शुरू होने से ठीक पहले सभी उम्मीदवारों या उनके पोलिंग एजेंटों के सामने मॉक पोल कराया जाता है, जिसमें वीवीपैट (VVPAT) पर्चियों का मिलान भी शामिल है।
-
वीवीपैट का शत-प्रतिशत मिलान: सुप्रीम कोर्ट के आदेश और आयोग के नियमों के तहत हर विधानसभा क्षेत्र के 5 रैंडम बूथों की VVPAT पर्चियों का ईवीएम के वोटों से अनिवार्य मिलान किया जाता है।
2. राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और नेतृत्व की भूमिका
-
सत्ता पक्ष का पक्ष: शासक दल और आलोचकों का यह मानना है कि तकनीकी रूप से पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी व्यवस्था होने के बावजूद जब भी चुनाव परिणाम अनुकूल नहीं आते, विपक्ष ईवीएम और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करने लगता है। उनके अनुसार, वास्तविक सुधार की आवश्यकता राजनीतिक दलों की नीतियों, जनहित के मुद्दों और जमीनी नेतृत्व में है।
-
विपक्ष का रुख: दूसरी ओर, विपक्षी दलों का तर्क रहता है कि चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता केवल तकनीकी स्तर पर नहीं, बल्कि राजनीतिक निष्पक्षता और संस्थाओं के स्वतंत्र कामकाज पर भी आधारित होनी चाहिए।
‘ऑल RIGHTs मैगजीन’ का दृष्टिकोण
लोकतंत्र की मजबूती के लिए जनता का चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं पर अटूट विश्वास होना अनिवार्य है। ईवीएम की तकनीकी सुरक्षा अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन राजनीतिक दलों के बीच आपसी विश्वास और स्वस्थ संवाद का माहौल ही लोकतंत्र को दीर्घकालिक मजबूती प्रदान करता है।
‘ऑल RIGHTs मैगजीन’ देश की राजनीतिक बहसों, चुनावी प्रणालियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं से जुड़ी हर खबर को निष्पक्षता के साथ पाठकों तक पहुँचाती है।
गोपाल चन्द्र अग्रवाल,
सीनियर एडिटर (Allrights Magazine)
मिजोरम यूथ कांग्रेस की बैठक: 25 हजार खाली पदों पर संग्राम!
