बिना किसी सरकारी मदद के एक सूख चुके तालाब को ज़िदा कर दिया !
पानी की ज़रूरत ने बरेली के सहसिया हुसैनपुर के लोगों को इतना ज़िम्मेदार बना दिया कि उन्होंने बिना किसी सरकारी मदद के एक सूख चुके तालाब को ज़िदा कर दिया। करीब 500 मीटर के इस सूखे गड्ढे में तब्दील तालाब को ग्रामीणों ने दस मीटर लंबे और दस मीटर चौड़े गहराई तक खोद कर लबालब कर दिया है।
गांव वालों के श्रमदान से अब इस तालाब में आसपास के खेतों का पानी जाता है और बारिश का भी पानी इकट्ठा होता है। जब बारिश से अच्छी मात्रा में पानी भर जाता है तो इसका उपयोग ग्रामीण सिंचाई के लिए भी करते हैं। बरेली ज़िले में यही एक तालाब है जो लोगों के श्रमदान से लबालब है।बरेली शहर से आठ किलोमीटर दूर इस गांव के लोगों को एकजुट कर रहे हैं राजनारायण गुप्ता। दो हज़ार की आबादी और करीब 1200 मतदाताओं वाले इस गांव के बारे में अण्णा आंदोलन से जुड़े और विकल्प संस्था चलाने वाले राजनारायण बताते हैं कि 2011 में इस गांव को गोद लेकर इसे अण्णा के रालेगण सिद्धि की तरह बनाने का विचार किया था। इसके बाद लोग मिलते गए और कारवां बनता गया। वे बताते हैं कि तालाब का काम 2016 में शुरू किया था, इसके बाद से यहां पानी भरा ही रहता है जबकि आसपास के तालाबों में इस तालाब जितना पानी भी नहीं है। उनके साथ संस्था के लोग तो जुटे ही, साथ में गांव के रूप लाल गंगवार, प्रदीप गंगवार, सुरेश कुमार, बिंदु शर्मा और पूनम शर्मा जैसे लोगों ने बढ़-चढ़कर साथ दिया। गांव के सुरेंद्र कुमार हिंदी से परास्नातक हैं और बिंदु शर्मा बरेली कॉलेज में अंग्रेज़ी से परास्नातक कर रहे हैं। इनके अलावा पूनम शर्मा तालाब के साथ गांव में बच्चों को पढ़ाने का काम भी करती हैं। गांव के रूपलाल गंगवार बताते हैं कि तीन साल से इस तालाब में पानी भरा हुआ है जो पिछले 20 साल से सूखा पड़ा था। दरअसल, तालाब बनाने की तकनीक अच्छे से पता न होने के कारण उसमें जलभराव नहीं हो पाता है। गंगवार बताते हैं कि प्रशासन की ओर से जो दो तालाब गांव में खोदे गए थे उनकी चारदीवारी उसी खोदी गई मिट्टी से ही बना दी गई । लोग बताते हैं कि जिस तालाब में गांव वालों ने काम किया वह सरकारी तालाब नहीं है, लेकिन श्रमदान से सूरत बदल गई। गांव के सुरेंद्र कुमार बताते हैं कि तालाब की निकली गीली मिट्टी को लोगों ने अपने घरों के खपरैल के लिए प्रयोग किया। बरेली के इस गांव ने श्रमदान से किया कमाल ! बरेली ज़िले के सहसिया हुसैनपुर गांव के राजनारायण बताते हैं कि 40 दिन तालाब को खोदने के लिए काम किया गया था, जिसमें गांव के सौ से अधिक लोग जुटे थे। पहले कठोर मिट्टी को गीला करने के लिए बारिश का इंतज़ार किया गया और फिर फावड़े और कुदाल लेकर लोगों ने कायाकल्प कर दिया। इस गांव में दो सरकारी तालाब हैं लेकिन वहां इतना पानी नहीं है।
